सौतन खटिया


जब से जवनिया के चोलिया में बंध नी,
नगरिया के सब कोई पूछे ला उमरिया,
कैसे कहीं ए सखी, शर्म के छोड़ के?
सौतन भइल बिया जाड़ा में खटिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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चाहे रख दी चोली खोलके


सैया माँगता दाल पे आचार
घी, दही सजाव छोड़ के.
का से कहीं दिल के बात सखी
आपन लोक-लाज – शर्म छोड़ के.

सांझे के सेजिया पे पसर जालन
कतनो बैठीं श्रृंगार करके।
सैयां निकलल बाटे नादान
का से कहीं, लोक-लाज – शर्म छोड़ के.

तनको ना छुए मिष्ठान
चाहे रख दी चोली खोलके।
तूड़ देहलन सारा दिल के अरमान
का से कहीं, लोक-लाज – शर्म छोड़ के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

पर मोदी जी


पीया हो गइलन परदेश के गुलाम हो,
तनी मोदी जी गांव के भी करि विकास हो.
कट त जाला जेठ और आषाढ़,
पर मोदी जी अकेले ना कटे इ माघ हो.
तनी मोदी जी गांव के भी करि विकास हो.

दुआरा – अंगना, खेत – खलिहान,
हम सब कर लेवेनि।
सास – ससुर, गाय – बैल,
हम सब देख लेवेनि।
पर मोदी जी सेजिया के चोट ना सहात हो.
तनी मोदी जी गांव के भी करि विकास हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कोई अँचरा के हमार ना देख ले


तनी धीमा करीं आग के दुवरा पे,
कोई अँचरा के हमार ना देख ले.

पूछे लागल बारी राउर माई आजकल,
कहाँ जा तारु आधी रात के किवाड़ खोल के.

छोड़ दी आज खटिया के राजा जी,
बिछा लीं चटाई आज भुइयां में.

ना होइ इ खेला रोज – रोज अब हमरा से,
कब तक करीं इ झूठ और ढोंग सास – पतोह से।

जाप और योग करे सब कोई रउर – हमरा उम्र के,
बस हमरा के फँसाइले बानी रउरा इह पाप – कर्म में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माई हमके बड़ी सुनाई


हमरा खटिया, हमरा खटिया,
हमरा खटिया पे ए राजा जी,
ऐसे ना जोड़ लगाईं।
टूट जाइ एकर पाया त,
माई हमके बड़ी सुनाई।

रउरा खातिर देखि का – का करSतानी ,
मिलSतानी रोजे चोरा के,
आ केवाड़ रखSतानी खोली के.
हमरा अंगना में ए राजा जी,
ऐसे ना रात बिताईं।
चूड़ी जे जाइ खनक त,
माई हमके बड़ी सुनाई।

कहS तानी रउरा से,
की जल्दी से शादी कर लीं हाँ.
ना त छोड़ीं हमार पीछा,
हमरो के अब बसे दीं हाँ.
हमरा जोबना, हमरा जोबना,
हमरा जोबना के ए राजा जी,
ऐसे मत बढ़ाईं।
दरजी कर दी शिकायत त,
माई हमके बड़ी सुनाई।

 

परमीत सिंह धुरंधर

बिहारी : एक जंगली फूल


वक्त ने कुछ ऐसे
बिहारियों को बिखेरा है.
की कैलिफोर्निया से मारिसस तक
बस भोजपुर और भोजपुरिया का जलवा है.

जहाँ हर उम्मीद टूट जाती है
गहन अँधेरे के तले दब कर.
वहाँ भी हमने अपनी स्वर-संस्कृति-संगीत से
अपनी माटी का दिया जलाया है.

कुछ जलते हैं
कुछ हँसते हैं
कुछ हमें मिटाने की
हसरते पाले हैं.

मगर जंगली फूल ही सही
खुसबू विहीन, रंगहीन ही सही
हमने अपने खून -पसीने से
बंजर को भी गुलशन बनाया है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

हमरे खटिया पे सवार रहलू


याद करअ जहियाह कुंवार रहलू,
अंग – अंग से तू हमार रहलू।
करवाचौथ के उपवास हमारा नाम पे
हर सोमारी सावन के हमरे खातिर करत रहलू।
शिव जी से हमरे के माँगत हर बार रहलू।
याद करअ जहियाह कुंवार रहलू,
अंग – अंग से तू हमार रहलू।

अइसन कउनो ना इतवार नागा भइल,
जब तू ना हमारा बथान में ओंघाइलु।
हमरा बैलन के तू ख़ास प्यार रहलू।
याद करअ जहियाह कुंवार रहलू,
अंग – अंग से तू हमार रहलू।
खोटत हमरे खेतिया के साग रहलू,
हमरे बगिया के कचनार रहलू।
हमरे खटिया पे सवार रहलू।
याद करअ जहियाह कुंवार रहलू,
अंग – अंग से तू हमार रहलू।

 

परमीत सिंह धुरंधर