आँखों से सलाम लीजिये


दर्द में हर दिल का पैगाम लीजिये
मुस्करा कर ना सही
फिर भी आँखों से सलाम लीजिये।

मिल गए है कई साथी नए राहों में
पर पुराने खिदमतगारों का अपने
नजरें – करम लीजिये।

माना की पर्दा जरुरी है
पुराने दरकते दीवारों पे
मगर कभी तो
इन चारदीवारों में भी बैठ लीजिये।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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जाने कैसे?


मुझे तो मेरी यादे जीने ही नहीं देती
जाने कैसे?
लोग इश्क़ को आग का दरिया कहते हैं.
कब का छूट गए वो दोस्त
कब का भूल चुके मुझे वो लोग
कब का दुनिया की उलझनों में
सभी परिपक्व हो गए.
और मैं वहीं का वहीं
कितना भी आगे जा रहा हूँ,
दिल – दिमाग वहीं लगा रहता है
हर नए महफ़िल में
वो ही पुराने चिरागों को ढूंढता है.
मुझ से तो बिना इश्क़ के भी जिया नहीं जा रहा
और जाने कैसे?
लोगो को इश्क़ में जीना मुश्किल हो जाता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बिहार में लूट कर प्रेम में


इश्क़ अगर जामने में किसी ने किया है
तो सिर्फ बाबूसाहेब लोगों ने
आज का इश्क़ तो एक समझौता है.

एक वक्त था जब कहते थे
इश्क़ में बर्बाद हो जाओगे
आज तो बस इश्क़ में व्यापार होता है.
और ये व्यापार ही है
जिसके अंत में घाटे – फायदे का हिसाब होता है.

एक वक्त था
हम बिहार में लूट कर प्रेम में
कलकत्ता में जी लेते थे
किसी का नौकर बनकर
तो किसी के हाथगाड़ी में बंधकर।
आज तो घाटा ज्यादा हो प्रेम में तो
हत्या या आत्महत्या, इसका अंजाम होता है.

इश्क़ अगर जामने में किसी ने किया है
तो सिर्फ बाबूसाहेब लोगों ने
आज का इश्क़ तो एक समझौता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

इश्क़ बड़ा महँगा है दोस्तों – 2


धीरे – धीरे
ढो के ले गयी
मेरे घर का कोना – कोना।
हल्दी – धनिया, सिलवट – लोढ़ा
बाबू जी का गमछा,
और माई का बिछोना।
इश्क़ बड़ा महँगा है दोस्तों
जिसने इस बाबूसाहेब को
सड़क पे ला दिया।

गजब की शौक़ीन थी मेरी बाहों का
हाँ, जब मैं अमीर था.
जिसकी आँखों के एक – एक रंग पे
मैंने उसकी अंगों पे
दूध, दही, घी, बतासा
अदौरी – तिलोड़ी, पकोड़ी
आंटा, सतुआ, चिउरा
अरे अपने पूर्वजों के एक – एक
संचित धन का भोग लगा दिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़ बड़ा महँगा है दोस्तों


उनकी आँखों ने मेरा हर रंग उतार दिया
चोली के एक – एक बटन पे
उसने मेरा एक – एक बिगहा ले लिया।
इश्क़ बड़ा महँगा है दोस्तों
जाने वो कैसे कहतें हैं?
की उन्होंने ने अपना इश्क़ पा लिया।

वो जाने चढ़ गयी किसकी डोली?
उसकी नसीब बनकर
जिसकी वक्षों के एक – एक स्पंदन पे
हमने खेत -खलिहान, बागान -बथान
गाय – बैल, भैंस – बकरी
नाद, खूंटा, भूंसा
अरे पगहा तक उसके नाम लिख दिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मरुस्थल


रक्त की बून्द में
तपिश हो प्यास की.
बादल भी ना बरसें
उमड़ कर जिस धरती।
वैसे मरुस्थल में भी
मैं रखूंगा चाहत बस तेरी।

तू सावन बनती रहे
यूँ ही गैरों के आँगन की.
हर पतझड़ के बाद भी
मैं रखूंगा उम्मीदें एक बसंत की.

 

परमीत सिंह धुरंधर

औरत को कोई समझ न सका


वो शहर की हर एक गली में मचली
मगर उनका प्यास फिर भी ना मिट सका
अंत में उनकी फिर ये ही रह गयी शिकायत
उनके अंदर की औरत को कोई समझ न सका.

 

परमीत सिंह धुरंधर