फगुआ के मज़ा लूटह


जीयह हो Crassa भाई जीयह,
फगुआ के मज़ा लूटाह।
सब कोई पीये ताड़ी लोटा से,
तू चोलिये से ताड़ी पीयह।

जीयह हो Crassa भाई जीयह,
फगुआ के मज़ा लूटाह।
सब कोई पीये ओठवा से,
तू अंग-अंग से पीयह।

जीयह हो Crassa भाई जीयह,
फगुआ के मज़ा लूटाह।
सब कोई तोड़े पलंग,
तू देवाल के ही ढाहह।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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वक्षों से संग्राम ना हो


वो वक्ष नहीं,
जो विशाल ना हो.
अनंत तक जिसका,
विस्तार ना हो.
जिसपे क्राससा जैसा भ्रमर,
नितदिन करता रसपान ना हो,
विश्राम ना हो.

ग्रीष्म क्या, शरद ऋतू क्या?
वो वक्ष नहीं,
जिसपे हर क्षण विकसित,
कोई वसंत ना हो.
वो यौवन क्या?
जिसको अपने वक्षों पे गुमान ना हो.
और वो वीर ही क्या?
जिसके जीवन में वक्षों से संग्राम ना हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जब तक ना उतरेगी मेनका


सारा – शहर है मेरी नजर पे फ़िदा,
तुम कैसे बचोगे, कब तक ?
विश्वामित्र का वंशज हूँ,
ना पिघलूंगा, जब तक ना उतरेगी मेनका।

पत्थर बनके कहीं मिट ना जाओ,
चख लो समंदर का अमृत ज़रा.
विश्वामित्र का वंशज हूँ,
रचूंगा नया सवर्ग अपना।

ढल जाएगा यौवन, तो हाथ मलना पडेगा,
देख – देख के छलकता गागार यहाँ।
विश्वामित्र का वंशज हूँ,
अनंत तक चमकूंगा बांके सितारा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

वक्ष अध्यात्म का प्रथम और आखिरी पाठ हैं


वक्षों पे ही मोक्ष है,
जो प्राप्त कर ले इन्हे,
वो ही वशिष्ठ और अगस्त्य है.
यूँ ही भीष्म ने नहीं रोक लिया था,
अपने तीरों को,
जो वीर हैं, वो उठाते नहीं,
इनपे तीर और तलवार हैं.

जलवाई को नियंत्रित करते,
इस भीषण – प्रचंड शीतलहर में,
ये ही हैं जो धमनियों को निरंतर,
रखते हैं जागृत और उनमे,
रक्त को करते संचारित।
कामुकता नहीं, अध्यात्म का,
बस यही प्रथम और आखिरी पाठ हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

वक्षों पे ही मोक्ष है


व्याकुल मन को शांत कर दे,
चित को कर दे एकाग्र।
योग – माया क्या है ये जीवन?
वक्ष ये केवल वक्ष नहीं हैं,
ये हैं मोक्ष – अमृत – परमानंद का भण्डार।

हिमालय सा उन्नत ये,
सुसुप्त अवस्था में भी रखते हैं,
समुन्द्र सा ज्वार।
अपूर्व – अन्नत इस ब्रह्माण्ड में,
ये वक्ष ही करते हैं जीवन का संचार।
वक्ष ये केवल वक्ष नहीं हैं,
ये हैं वीरों का अभिमान।

 

परमीत सिंह धुरंधर

पर मोदी जी


पीया हो गइलन परदेश के गुलाम हो,
तनी मोदी जी गांव के भी करि विकास हो.
कट त जाला जेठ और आषाढ़,
पर मोदी जी अकेले ना कटे इ माघ हो.
तनी मोदी जी गांव के भी करि विकास हो.

दुआरा – अंगना, खेत – खलिहान,
हम सब कर लेवेनि।
सास – ससुर, गाय – बैल,
हम सब देख लेवेनि।
पर मोदी जी सेजिया के चोट ना सहात हो.
तनी मोदी जी गांव के भी करि विकास हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अंग-अंग से तुम मचली हो


एक हाथ की दूरी हो,
साँसों से मेरे तुम महकी हो.
दरिया बनके मुझे डुबोने को,
अंग-अंग से तुम मचली हो.

क्या शर्म और हया?
कुल – मर्यादा सब भूल कर,
यौवन की मदिरा में बहकी हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर