उस लड़की के वक्षों पे


यारो मैं प्यार करूँगा उस लड़की की बाहों में,
जिसके सपनों में बस हम हों,
और कोई ना हो उन आँखों में.
मेरा इंतजार जो करती हो चूल्हे और चौखट के बीच में,
चैन ना हो, जब तक आवाज घुंघरू की मेरे बैलों के,
पड़ ना जाये उन कानों में.
यारों मैं अंक भरूंगा उस लड़की के अंगों से,
जिसके सपनों में बस हम हों,
और कोई ना हो उन आँखों में.
जो बिना मुझे खिलाएं, ना खाये एक अन्न का भी दाना,
बिना मेरे मुस्कान के, ना खनके पायल जिसके पावों में.
यारों मैं तो रंग डालूंगा उस लड़की के वक्षों पे,
जिसके सपनों में बस हम हों,
और कोई ना हो उन आँखों में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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बेगम – जान


आवsअ दिल के दिल से करार करके,
तहरा के बेगम – जान कह दीं.
तू पीसsअ सरसो हमार सिलवट पे,
हम घर-दुआर सब तहरा ही नाम कर दीं.
जहिया से देखनी रूप तहार पनघट पे,
प्यास उठल बा अइसन इह मन में,
की मन करे पनघट पे ही घर कर दीं.
आवsअ तहरा अधर-से-अधर जोड़ के,
तहके आज आपन प्राण -प्यारी कह दीं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

गुलेलिया


अब मार द गुलेलिया ए हमार राजा,
कब तक खेल ब ई खेल अंखिया के.
फंस जाइ चिड़ियावा दूसर के जाल में,
जे देख अ त रही ब बस बाग़ के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अइसन जावानी आयिल बा


मुखिया और मुखिया के बेटा, दुनु बारानसन हमारा फेर में,
अइसन जावानी आयिल बा ऐ माई हमारा देह पे.
एगो देता साड़ी त अ एगो देता हमके नया चोली।
बुधव से जवनका, सब केहू मांग आ ता हमारा के ही सेज पे.
अइसन जावानी आयिल बा ऐ माई हमारा देह पे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मस्ती में बहो मेरे बैलों


दुल्हन सी सजा दू धरती,
सावन सा आँचल इसका।
ऐसे मस्ती में बहो, मेरे बैलों,
की चमक उठे हर कोना इसका।
प्यासे हर कण की,
प्यास मिटा दूँ अपने पौरष से.
हर बदली, हर दरिया, फिर चाहे,
भिगोना बस आँचल इसका।

 

परमीत सिंह धुरंधर

रामाश्रय सिंह : एक योद्धा


चिलचिलाती धुप हो,
या हो कड़कड़ाती सर्दी।
बैल उसके बहते रहते,
ना सुनी पड़ी,
कभी उसकी धरती।
एक योद्धा था, एक योद्धा था,
रामाश्रय सिंह एक योद्धा था,
जिसके लिए रोई थी उसकी माटी।
गड़ासे चले, कुल्हाड़ी चली,
कोर्ट में चले कितने मुक़दमे।
फिर भी बाँध ना सके उस अकेले को,
सौ -सौ, भी एक बार, मिल के.
एक योद्धा था, एक योद्धा था,
जिसके लिए रोई थी उसकी माटी।
छपरा से कलकत्ता तक,
बस जिसके नाम की ही एक गूंज थी.
साभाओं -महासभाओं में जिसकी ही बस,
चली और बोलती थी.
एक योद्धा था, एक योद्धा था,
जिसके लिए रोई थी उसकी माटी।
ज्ञानी इतना ज्ञान में, जिसका न कोई सानी,
रामायण – महाभारत के किस्से,
जिसने सुनाये मुझे मुहजाबानी।
गर्व है मुझे की मेरे नस – नस में,
दौड़ता रुधिर, है उस योद्धा की निशानी।
एक योद्धा था, एक योद्धा था,
रामाश्रय सिंह एक योद्धा था,
जिसके लिए रोई थी उसकी माटी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मठ्ठा सैंया


काट ल दही परके छाली सैंया,
ना त महला पे मिली मठ्ठा सैंया।
छोड़ द सबके दुआर अगोरल,
भूल जा राति के बथानी में पसरल।
लूट जाइ थाती त बस बाची टूटल ठाटी सैंया।

 

परमीत सिंह धुरंधर