शहर – गाँव


शहरों में घर नहीं मकान है
बाकी सब जगह बस दूकान हैं
जहाँ बस दौलत ही एक पहचान है.

गाँव में आँगन है, बथान है
खेत है खलिहान है
बाग़ और बागान है
जहाँ झूलते झूले छूते आसमान हैं.

शहरों में रौशनी नहीं
चकाचौंध है.
जिस्म की, फरेब की
हर किसी को रौंद कर
आगे बढ़ने के जिद की.

गाँव में उषा है
गोधूलि बेला है
जुगनू के साथ हाथ मिला कर
अंधेरों से लड़ती दिए की बाती।

शहर में बिन व्याही पतोहि है
बेटी से पहले माँ ने व्याह रचाई है.
एक घर में रह कर भी
सबके बीच गहरी खाई है.

गाँव में सब कुवारी
सबकी बेटी
और बूढी, सबकी माई हैं.
घर छोटा और टूटा – फूटा
पर खाते सब संग
और सबकी संग ही लगती चारपाई है.

परमीत सिंह धुरंधर

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वो जिस्म में एक दिल रखते हैं


मेरे बैलों के दो सींग हैं
जिसपे वो मेरे आन – शान
को धारण करते हैं.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

कड़ाके की सर्दी हो
या भीषण गर्मी
बहते हैं दोनों झूम-झूम के.
मेरे तपते पीठ और ठिठुरते जिस्म
की खबर रखते है.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

मेरे बच्चों की भूख
मेरे परिवार के भविष्य
का ख्याल रखते हैं.
मेरे बैलों के दो सींग हैं
जिसपे वो मेरे आन – शान
को धारण करते हैं.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

जब तक ना बांध दूँ
दोनों को नाद पे
पहला खाता नहीं है.
और बाँधने के बाद दूसरा
पहले को खाने नहीं देता है.
नित – निरंतर, नाद पे, खूंटे पे
खेत में, बथान में
अपने सींगों को उछाल – उछाल
वो प्रेम की नयी परिभाषा रचते है.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

खाते हैं घास – फुस
इठला कर, उमंग से
पर नाद में सने नाकों से
घर के पकवानों पे नजर रखते हैं.
अपने हाथों से गृहलक्ष्मी जो ना
उन्हें भोग लगाए
तो फिर नए पकवानो के तलने
और भोग तक उपवास करते हैं.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

उस लड़की के वक्षों पे


यारो मैं प्यार करूँगा उस लड़की की बाहों में,
जिसके सपनों में बस हम हों,
और कोई ना हो उन आँखों में.
मेरा इंतजार जो करती हो चूल्हे और चौखट के बीच में,
चैन ना हो, जब तक आवाज घुंघरू की मेरे बैलों के,
पड़ ना जाये उन कानों में.
यारों मैं अंक भरूंगा उस लड़की के अंगों से,
जिसके सपनों में बस हम हों,
और कोई ना हो उन आँखों में.
जो बिना मुझे खिलाएं, ना खाये एक अन्न का भी दाना,
बिना मेरे मुस्कान के, ना खनके पायल जिसके पावों में.
यारों मैं तो रंग डालूंगा उस लड़की के वक्षों पे,
जिसके सपनों में बस हम हों,
और कोई ना हो उन आँखों में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बेगम – जान


आवsअ दिल के दिल से करार करके,
तहरा के बेगम – जान कह दीं.
तू पीसsअ सरसो हमार सिलवट पे,
हम घर-दुआर सब तहरा ही नाम कर दीं.
जहिया से देखनी रूप तहार पनघट पे,
प्यास उठल बा अइसन इह मन में,
की मन करे पनघट पे ही घर कर दीं.
आवsअ तहरा अधर-से-अधर जोड़ के,
तहके आज आपन प्राण -प्यारी कह दीं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

गुलेलिया


अब मार द गुलेलिया ए हमार राजा,
कब तक खेल ब ई खेल अंखिया के.
फंस जाइ चिड़ियावा दूसर के जाल में,
जे देख अ त रही ब बस बाग़ के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अइसन जावानी आयिल बा


मुखिया और मुखिया के बेटा, दुनु बारानसन हमारा फेर में,
अइसन जावानी आयिल बा ऐ माई हमारा देह पे.
एगो देता साड़ी त अ एगो देता हमके नया चोली।
बुधव से जवनका, सब केहू मांग आ ता हमारा के ही सेज पे.
अइसन जावानी आयिल बा ऐ माई हमारा देह पे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मस्ती में बहो मेरे बैलों


दुल्हन सी सजा दू धरती,
सावन सा आँचल इसका।
ऐसे मस्ती में बहो, मेरे बैलों,
की चमक उठे हर कोना इसका।
प्यासे हर कण की,
प्यास मिटा दूँ अपने पौरष से.
हर बदली, हर दरिया, फिर चाहे,
भिगोना बस आँचल इसका।

 

परमीत सिंह धुरंधर