I want to be a mom


I am tired of kisses,
And all glasses,
I want to have babies,
I want to be a mom.

I have enjoyed enough,
all attentions and smooches,
And one night stand,
Now I want to be a wife,
Just a simple housewife.

I have ruled the whole world,
by shaking my booty,
and showing my boobs,
Now, I want to be loyal,
I want to be a shy woman.

I am tired of cakes,
And all dark chocolates.
I want to fed my babies,
I want to be a mom.

 

Parmit Singh Dhurandhar

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मंगलसूत्र अब पहनाना छोड़ो दोस्तों


अपनी – अपनी जिंदगी को जियों दोस्तों,
दूसरों के लिए लड़ना छोड़ो दोस्तों।

ये काम हैं फेमिनिस्टों – कम्युनिस्टों का,
कभीं उनको ये करने से ना रोको दोस्तों।

अगर हौसला है तो सामाज के लिए खुद को बदलो,
दूसरों को जयचंद कहना छोड़ो दोस्तों।

रोने का काम है नारी और केजरीवाल का,
कभीं उनको ये करने से ना रोको दोस्तों।

हौसला है तो सीमा पे लड़ों,
गलियों में मुठभेड़ अब छोड़ो दोस्तों।

काली – काली रातों को काली घटाओं का पता,
किसको है खबर और अंदेशा किसको दोस्तों।

हौसला हैं तो खुद मशाल बनो।
बिजलियों से रौशनी के लिए हाथ जोड़ना छोड़ो दोस्तों।

माँ का दूध पीया है तो सेवा भी करों,
बीबी के आँचल में सोना छोड़ो दोस्तों।

बिहारी हो तो गर्व से कहना सिखों,
ये फेसबुक – व्हाट्सप पे लिखना अब छोड़ो दोस्तों।

सारे ही रिश्ते हैं यहाँ फरेब के,
मंगलसूत्र अब पहनाना छोड़ो दोस्तों।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरी माँ से मधुर, जग में कुछ भी नहीं


mom

मेरी माँ से मधुर, जग में कुछ भी नहीं।
मेरे पिता से चतुर, जग में कोई नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा प्रबल,
विकट – विरल, इस धरा पे कोई नहीं।

मेरी माँ से निर्मल, कोई गंगा नहीं,
मेरे पिता से प्रखर कोई सूर्य नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा अहंकारी,
अभिमानी, उन्मादी, उस सृस्टि में कोई नहीं।

मेरी माँ से सुन्दर, इस ब्रह्माण्ड में कोई नहीं।
मेरे पिता से तेजस्वी, इस त्रिलोक में कोई नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा धुरंधर,
भयंकर, और विशाल समुन्दर, कोई नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

तू खांटी सरदारनी, मैं बांका बिहारी


वो शाम की अंगराई, वो रातों की रजाई,
तू मिल जाए मुझको तो, तेरी माँ को मिले जमाई।
तेरी पतली कमर, जैसे मिटटी की ठंढी सुराही,
तू मिल जाए मुझको तो, तेरी माँ को मिले जमाई।
तू खांटी सरदारनी, मैं बांका बिहारी,
तू मिल जाए मुझको तो, तेरी माँ को मिले जमाई।

 

परमीत सिंह धुरंधर

त्वरित – तरंगों से भगीरथ सा विचलित रहता हूँ


तेरी गहरी -गहरी आँखों में,
मैं गहन – गहन अध्ययन करता हूँ.
तेरे गहन – गहन इन नयनों का,
मैं गहरा अध्ययन करता हूँ.

तेरे सुर से इन साँसों में,
मैं मदिरा का अनुभव करता हूँ.
तेरी कमर की इस लचकता पे,
मैं भ्रमर सा गुंजन करता हूँ.

कभी आ जा भी तू,
साक्षात मेरे उपवन में,
नित रात्रि में स्वपन में,
तेरा अभिनन्दन करता हूँ.
पुष्प सी पुलकित हो,
मृग सी बिचरती है धरा पे,
तेरे यौवन के त्वरित – तरंगों से,
मैं भगीरथ सा विचलित रहता हूँ.

धनुष की प्रतयंचा सी,
तू कसी- कसी सी,
मैं राम सा तुझे कसने को,
हर पल में प्रबल रहता हूँ.
घनघोर घटा सी जुल्फे तेरी,
चन्द्रमुख को ढक लेती है जब,
चकोर सा व्याकुल -विचलित,
मैं तेरी आभा को तड़पता हूँ.

तेरी गहरी -गहरी आँखों में,
मैं गहन – गहन अध्ययन करता हूँ.
तेरे गहन – गहन इन नयनों का,
मैं गहरा अध्ययन करता हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर