स्वाभिमान का दीप


आइए,
जिंदगी है,
तो गम उठाइए।
देव नहीं तुम,
जो रस का भोग हो।
ना दानव हो तुम,
जो दुष्ट तुम बनो।
मानव हो,
मृत्यु से तुम बंधे।
तो साँसों में,
स्वाभिमान का दीप,
जलाइए।
आइए,
जिंदगी है,
तो गम उठाइए।
इस धरा पे,
हर दुःख,
तुम्हारे लिए।
इन राहों की,
हर पीड़ा,
सिर्फ तुम्हारे लिए।
मगर,
जवानी है तुमको मिली,
तो हिमालय से,
टकराइए।
आइए,
जिंदगी है,
तो गम उठाइए।

परमीत सिंह धुरंधर

संघर्ष और चाहत


संघर्ष ही जीवन का मिठास है, दोस्तों,
हर नदिया प्यासी, सागर के खाड़ेपन को.
चकोर की चाहत वो चाँद दूर का,
जिसके आँगन में सितारे और दामन में कई दाग हैं।

परमीत सिंह धुरंधर

हौसला


मंजिलों का क्या है,
राहें भटका देतीं हैं.
राहों का क्या है,
मंजिले मिटा देती हैं.
अपने हौसलों से,
चलता है मुसाफिर,
वरना आँधियाँ तो,
हर चिराग बुझा देती है.
दर्द पे अपने लबों को,
सी ले तू.
ख़राब मौसम तो,
पुराना हर रोग बढ़ा देती है.

परमीत सिंह धुरंधर

ऐसी रात हो


ग़मों की ऐसी रात हो,
तुम्हारी जुल्फें,
मेरे सीने पे बिखरीं हों.
मेरी आँखों से बरसते आंसूं,
तुम्हारी गालों पे थिरकती हों.
थका, निराश मन, हार कर,
तुम्हारी आगोस में पनाह ले.
और एक नयी सुबह के जोश में,
उठे, बढे, संग तुम्हारे,
एक नईं मंजिल की और.
अंततः,
तुम्हारे अंगों पे,
मेरे जंगे-जीत की निशानी हों.
ग़मों की ऐसी रात हो,
तुम्हारी जुल्फें,
मेरे सीने पे बिखरीं हों.

परमीत सिंह धुरंधर

मैं तब भी लड़ूंगा


जहाँ जवानी का एहसास न हो,
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
आहे भरने की न फुर्सत हो,
ना शिकायत के शब्द गढ़ने की.
जहाँ जिस्म को सावन का,
मन को प्रियतमा का एहसास न हो.
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
पग थक गए हो, पर पथ ख़त्म न हो.
आँखे मूंद रही हो, पर मंजिल न हो.
तन से रिस्ते खून को भी बहने से,
रोकने का जब समय न हो.
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
ह्रदय में हुंकार तो उठे, पर
आँखों से बहे भी ना बन के धारा।
जब अपनी ही साँसे बोझ लगे,
और कोई न हो सहारा।
जब मेरे बस में ही मेरा वक्त न हो.
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
मैं तब भी आगे बढूंगा,
मैं तब भी चलूँगा।
मैं तब भी लड़ूंगा,
ऐसी कोई ललकार तो हो.
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
जहाँ जवानी का एहसास न हो,
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.

परमीत सिंह धुरंधर

प्रण और चुम्बन


जब ग़मों की रात हो, प्रिये,
तुम ओठों से पिला देना।
जब नींदें न हों आँखों में,
ख़्वाब न हो जीने को.
तुम आँचल अपने सरका के,
अंगों को छलका देना।
कांटे – ही – कांटे हो पथ में,
और प्यास से कंठ भी अवरुद्ध हो.
तुम आँखों की मदिरा को अपने,
मेरे नस – नस में उतार देना.
जब तुम ही मेरे साथ तो,
तब विकत क्या है कोई प्रण मेरा.
मेरे हर पराजय पे भी तुम यूँ ही,
विजय श्री का मीठा चुम्बन लगा देना.

परमीत सिंह धुरंधर

मैं भगीरथ सा अडिग हूँ


मैं धीमा – धीमा,
पर प्रबल हूँ.
तुम त्वरित-त्वरित,
पर क्षणिक हो.
मैं दीप, दीपक सा,
प्रज्जवलित हूँ.
तुम अग्नि सा,
प्रचंड हो.
यह जंग हैं,
अपने इरादो की.
मेरे प्रयासों की,
तुम्हारे लालसाओं की.
तुम सुरसा सा,
विकृत हो.
मैं भगीरथ सा,
अडिग हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर