जॉन – बिपाशा – करण: एक त्रिकोण


जैसे ही मैंने बिपाशा को अपनी बाहों में खींचा अपने ओठों के करीब, उसने मेरे कानो में धीरे से कहा, “तुम बाप बनने वाले हो.” बिजली के एक झटके से मैं उससे अलग होके, बिस्तर से कूद पड़ा.
मैं, ” ये क्या कह रही हो तुम? ये कैसे हो गया?”
बिपाशा सिर्फ मुस्करा रही थी जैसे मैंने कोई बेवकूफी कर दी हो. कुछ देर यूँ ही मुस्कराते और मुझे देखने के बाद उसने कहा, “तुमने ही तो किया है, इसमें इतना परेशान होने की जरुरत नहीं। मैं सब संभाल लुंगी, तुम्हे कुछ करने की जरुरत नहीं।”
मैं, “लेकिन बिपाशा, हम ने ये तय किया था न की अभी तीन – चार साल नहीं। चलो कल जाके गर्भपात करा लेंगे।”
बिपाशा, “देखो मुझे नहीं पता क्या तय हुआ था. मैं ऐसा कुछ नहीं करने वाली। ये मेरा सपना है. एक औरत मातृत्व के सुख के बिना अधूरी है. और, मैं ३५ की हूँ, चार साल मैं नहीं रुक सकती। मैं सिर्फ तुम्हे बता रही थी क्यों की अब पांचवा महीना है. मैं गर्भपात नहीं कर सकती।”
इतना सुनते ही मेरे पाँवों की जमीन खिसक गयी. मैंने कहा, “तुमने मुझे इतना बड़ा धोखा दिया। अगर तुम्हे मातृत्व का सुख ही चाहिए था तो जॉन के साथ ही ये सुख ले लेती।” इतना कह के मैं बाहर आ गया और सिगरेट सुलगा ली. वो अकेली कमरे में थी, मैंने उसकी दुखती नब्ज दबा दी थी.
कुछ देर बाद वो आयी और गले से लिपटते हुए बोली, “करण, तुम्हे पता है, जॉन ना तो शादी करना चाहता था ना ही वो बच्चा चाहता था. तुम अगर चाहते हो तो तलाक ले लेंगे, लेकिन मैं ये बच्चा चाहती हूँ.”
मैं, “बिपाशा, ये तो धोखा ही है न. तुम १० साल रही जॉन के साथ, लेकिन वो नहीं चाहता था, इसलिए तुमने अपने औरत बनने के सुख को ठुकराया। अब उस सुख के लिए तुमने मेरी आकांक्षाओं की परवाह नहीं की. इसका एक ही मतलब हैं की तुम्हे मुझसे प्रेम ही नहीं, तुमने सिर्फ बच्चे के लिए शादी की. अगर तुम्हे सिर्फ बच्चा ही चाहिए था तो तुम बिना जॉन को बताये भी तो कर सकती थी.”
बिपाशा, “तो क्या तुम दूध पीते एक बच्चे हो? तुम्हे नहीं पता था की शादी क्यों की जाती है? तुम सब मर्द एक से हो, तुम्हे सिर्फ जिस्म चाहिए। मैं उस समय तैयार नहीं नहीं माँ बनने के लिए. जब मेरा मन था तो जॉन शादी नहीं करना चाहता था. बिना शादी किये मैं माँ नहीं बन सकती थी
अगली सुबह, मैंने खुद को समझाया और बिपाशा के पास जाके माफ़ी मांगी और उसे डॉक्टर के पास जाने को बोला। उसने बताया, “मैं डॉक्टर से मिल आयी हूँ, मैं ठीक हूँ.” नौ महीने बाद मैं एक बच्चे का पिता और बिपाशा माँ बन चुकी थी. एक साल बाद जूनियर करण के जन्मदिन पे बिपाशा जिद पे अड़ गयी की जॉन को बुलाएँगे। मैं अचंभित था क्यों की उसी के चलते मैंने जॉन से बोलचाल बंद की, उसे शादी में नहीं बुलाया। बिपाशा, “जॉन मेरा एक अच्छा दोस्त हैं, उसने मुझे हर मोड़ पे सहयोग दिया है. मुझे नहीं समझ में आता, तुम्हे उससे क्या दिक्कत है.” अंत में मैं मान गया.
और आज तीन महीने बाद, हम दोनों का तलाक हो गया. बिपाशा फिर से जॉन के साथ रहने लगी हैं. मुझे कभी – कभी लगता है की उसने बस मुझसे बच्चे के लिए शादी की या जॉन को पाने के लिए. पत्रकारों को उसने तलाक के बाद कहा, ” मैं एक स्वभिमानी, स्वतंत्र, स्वयं पे निर्भर हूँ, मैं अपने बच्चे का लालन -पालन कर सकती हूँ. मैं आज की भारतीय नारी को एक संदेस देना चाहती हूँ की वो अपने बच्चे के लालन-पालन के लिए अपने पति पे निर्भर न रहें। मुझे ख़ुशी है की मेरा सच्चा दोस्त जॉन मेरे इस निर्णय के समय मेरे साथ है. और हाँ जॉन सिर्फ  मेरा दोस्त है, उसका अपना परिवार है, आप कृपया कुछ और न समझे।”

 

परमीत सिंह धुरंधर

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विक्रम और बेताल : कहानी 1


विक्रम ने बेताल को काँधे पे डाला और मौन हो के चल पड़ा. राह काटने के लिए बेताल ने एक कहानी कहनी शुरू की. एक राज्य छतरपुर  का राजा मानेन्द्र सिंह और रानी गिरजा देवी थी. गिरजा देवी बहुत ही कामुक प्रविर्ती की महिला थी, जिनका सारा दिन श्रृंगार और रास में जाता था. उन्हें न तो राज्य की चिंता थी न प्रजा की, वो तो बस भोग बिलास में लिप्त थी. मानेन्द्र सिंह भी तन- मन से गिरजा  देवी के गुलाम बन के नृत्य कर रहे थे, अपने कर्तव्यों से विमुह हो के. मानेन्द्र सिंह गिरजा देवी की तन – मन से सेवा कर रहे थे, लेकिन गिरजा की कामुक प्रविर्ती शांत होने का नाम नहीं ले रही थी. इसलिए धीरे धीरे  मानेन्द्र सिंह की जवानी ढलने लगी और उनका स्वास्थय गिरने लगा. पडोसी देस के राजा को जब ये खबर मिली तो उसने छतरपुर पे चढ़ाई कर दी और मानेन्द्र सिंह की हार हुई.
मानेन्द्र सिंह को बेड़ियों में जकड कर विजयी राजा, रानी गिरजा देवी के सामने दरबार में हाजिर हुआ. विजयी राजा ने गिरजा देवी से कहा की या तो आप मृत्यु को स्वीककर कर लो या मेरी बन जाओ. रानी गिरजा देवी ने विजयी राजा देव बर्मन की ये बात स्वीककर कर ली पर उन्होंने एक शर्त रखी. गिरजा देवी ने कहा की अगर विजयी राजा और उनके राज्य का कोई एक आदमी में से जो उनके साथ ज्यादा समय गुजरेगा उनके कमरे में, वो उसकी हो जाएंगी और वो ही इस राज्य का राजा होगा. देव बर्मन बहुत हर्षित हुए की रानी उनकी बनाना चाहती हैं और उन्हें भी हर किसी के साथ ये ही लगा की वो दूसरे आदमी के रूप में अपने राजा मानेन्द्र सिंह को चुनेंगी. मानेन्द्र सिंह के चेहरे पे अचानक ख़ुशी की लहर छलक उठी. लेकिन गिरजा देवी ने अपने स्वभाव के अनुसार इस बार फिर चकमा देते हुए राज्य के मंत्री को चुना।
रानी  ने देव बर्मन से कहा की चुकी आप विजयी राजा हैं आप पहले चले मेरे कमरे में. कमरे के बाहर गणितज्ञ लोग बैठे थे समय की गणना करने को. मूछों पे ताव रखते हुए देव बर्मन रानी गिरजा देवी के कमरे में गए और आधे घंटे से कम के समय में ही निकल गए. फिर राज्य के मंत्री कमरे के अंदर गए और पुरे दो दिन बाद निकले। पुरे राज्य में लोगो में उतसाह था. देव बर्मन ने पराजय स्वीककर कर ली और अपनी सेना के साथ वापस जाने लगे. रानी गिरजा देवी ने उनके पास जाकर कहा की हमारा उपहार स्वीकार करें। उन्होंने उपहार का इसारा अपने राजा, पति, प्रेमी, मानेन्द्र सिंह की ओर किया. सभी लोग विस्मित हो गए, ख़ास तौर पे मानेन्द्र सिंह। मानेन्द्र सिंह ने रानी से कहा, “गिरजा मैंने तुम्हारे लिए क्या –  क्या कुकर्म नहीं किये और तुम आज ये कर रही हो”. गिरजा ने हँसते हुए कहा, “पुत्र, अपने पिता की सेवा करो. इस उम्र में कुछ  धर्म करो.” मानेन्द्र सिंह मौन हो गए और फिर आज तक उनकी आवाज कभी नहीं सुनी गयी.
बेताल ने कहा, “विक्रम तू तो ज्ञानी है अब उत्तर दे, वार्ना तेरे माथे के टुकड़े – टुकड़े हो जाएंगे। तो बताओं, क्यों रानी ने मानेन्द्र सिंह को पुत्र कहा और क्यों मानेन्द्र सिंह मौन हो गए. राजन ये बताओं की मंत्री को दो दिन कैसे लग गए कमरे में?”.
विक्रम ने कहा, “रानी गिरजा चरित्रवान औरत थी और उसने  भले ही मंत्री से सम्बन्ध विवाहोत्तर बनाये, पर वो सम्बन्ध तब बना जब राजन अपनी पत्नी को पत्नी का सुख नहीं दे रहे थे। सच्चाई ये है की उन्होंने मन से मंत्री को ही अपना सबकुछ मान लिया था और राजा के साथ वो सिर्फ उसके डर से थी. इसलिए एक तरह से राजा मानेन्द्र सिंह रानी का बलात्कार करने के दोषी हुए. उन्होंने कभी रानी के मन को समझने की कोसिस नहीं की. इससे बढ़ के रानी ने अपनी बुद्धि से न केवल राज्य पे आये संकट को टाला, बल्कि उसने अपने मंत्री के सम्बन्ध को प्रजा के सामने भी रखा. एक रानी के राज्य-धर्म के अनुसार सारी प्रजा उसकी संतान हुई इसलिए रानी का राजा मानेन्द्र सिंह को पुत्र कहना धर्म-संगत है. राजा मानेन्द्र सिंह ने मौन हो कर अपनी हार स्वीकार कर ली जैसे उन्होंने  युद्ध भूमि में किया था.”
विकर्म ने आगे कहा, “देव बर्मन जीत के उत्साह और घमंड में समझ नहीं पाये और उन्होंने सिर्फ राज्या को भुला कर रानी गिरजा देवी के शरीर पाने पे धयान दिया। वहीँ रानी ने मंत्री के कान में कहा की तुम रोज चोरो की तरह आते थे और जल्दी जाते थे राजा मानेन्द्र सिंह के डर से. आज मर्द की तरह आवो और मर्द की तरह जाओ. इसलिए मंत्री ने आराम से खाना खाया, पानी पिया और बिस्तर पे सोया और फिर दो दिन तक गिरजा देवी के साथ रहा. इस तरह उन दोनों ने प्रजा को दिखाया की उनका प्रेम सच्चा है, और ये केवल वासना नहीं है.”
इतना सुनते ही वेताल हँसते हुए उड़ पड़ा. वेताल, ” विक्रम तू ज्ञानी है. तूने सच बोला, पर चुकी तूने अपना मौन तोड़ा है, मैं अब जा रहा हूँ.”

यह कहानी पूरी तरह से मेरी लिखी है.

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परमीत सिंह धुरंधर

प्रेम की विवशता


गोधूलि बेला में लम्बी होती परछाइयों को देखते – देखते, रात ने अपने चादर में छुपा लिया। रात के इस सन्नाटे में जब झींगुर चीत्कार करने लगे तो आँखों से बहते आंसू के साथ उसने किवाड़ों  को भिड़ा के, चूल्हे के गर्म आग पे पानी डाल दिया। अभी कमर को सीधा ही किया था, चारपाई पे लेट कर, अचानक एक साथ भौंकते कुत्तों ने उसकी अलसायी आँखों में एक साथ कई दीप जला दिए. यूँ ही लेटे-लेटे, वो एक हप्ते पहले ही आई चिठ्ठी को याद कर रही थी, तभी बहार बरामदे से ससुर जी की आवाज आई किसी के साथ बातचीत करते हुए. अचानक हवा के तेज झोंके सा वो बिना घूँघट के ही कब दरवाजा खोल कर ससुर के सामने पहुँच गयी, खुद उसे भी पता नहीं चला. जब उसे एहसास हुआ तो उसने आँगन में आ कर अपनी सास को जगा के बाहर भेजा और खुद चूल्हे में आग जला कर, हांडी चढ़ा कर कुछ मधुर सा लोक गीत गुनगुनाने लगी.
चाँद उस समय बिलकुल उसके सर के ऊपर से मुस्करा रहा था……
XXXXXXXXXXXXXXXX                                          भाग – 2                                                  XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX
हिमाचल प्रदेश मेरा हमेसा से प्रिये रहा है. इसका एक ही कारन रहा है की मुझे यहाँ आके ही नीलू मिली। जी हाँ नीलू, जिसकी बाँहों में आकर मैं जिंदगी की हर राह चल रहा था. आज तीन साल हो गए, हमें साथ रहते हुए. आज वैलेंटाइन डे पर मैं जल्दी उठ कर, उससे ही मिलने जा रहा हूँ.
मैंने गुलाब के चार गुलदस्तें लिए है, ये चौथा साल है हमारा। आज मैं उससे शादी के लिए पूछने वाला हूँ. जैसे ही विश्विधालय के प्रांगन में पहुंचा, मैंने नीलू की हाथों में गुलाब का एक बड़ा गुलदस्ता देखा। वो आज बहुत खूबसूरत लग रही थी और उसके साथ विनोद था. जैसे ही उसने मुझे देखा, वो तुरंत विनोद को छोड़ कर मेरे पास आई और मुझे दूर ले गयी. मैं उसकी इस अदा से बहुत खुश हुआ. मैं कुछ कहने वाला ही था की नीलू ने मेरे दोनों हाथों को अपने हाथों में ले कर मेरी धड़कने बढ़ा दी. उसने मेरी आँखों में देखते हुए कहा “बेबी, मुझे पता है तुम्हे दुःख होगा, लेकिन मैं अब ज्यादा तुम्हारे साथ नहीं रह सकती हूँ.” मुझे लगा की जैसे कोई मज़ाक है. फिर उसने कहा “बेबी, अब जब मैं तुम्हे देखती हूँ तो मुझे अपने भाई का एहसास होता है.” वो मेरा हाथ पकडे पांच मिनट तक जाने क्या सुनने का इंतज़ार कर रही थी और फिर मेरा हाथ छोड़ कर चली गयी. मैं समझ ही नहीं पाया की जाऊं कहाँ?
XXXXXXXXXXXXXXXX                                          भाग-३                                                    XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX
मैं ज्यूँ ही बस में आकर सीट पे बैठा, मेरी बगल में कोई औरत अपने दो बच्चो के साथ आके बैठी। कुछ देर बाद मुझे एहसास हुआ की वो दो बच्चो को एक सीट पे संभाल नहीं पा रही. एक बच्चे को अपनी गोद में लेने के लिए, मैंने ज्यूँ ही उसकी तरह नजर उठायी, मेरी निगाहें उससे देखती रह गयी. मैंने जैसे ही उसके एक बच्चे को पकड़ा, वो बोली ” जी मेरे बच्चे हैं.” मैंने कहा आप आराम से बैठिये। मैंने कहा “शायद तुमने मुझे पहचाना नहीं नीलू” फिर वो बोली “मैं अब व्याहता हूँ. मुझे छोड़ कर किसी कुवारी पे धयान दो, तो तुम्हारा कुछ हो.”  बस से उतरने के बाद वो बोली, “चलो घर पर, चाय पी कर जाना. यूँ भी बहुत दिन बाद मिले हो, वैलेंटाइन डे पे मुझे जो छोड़ के गए.” मेरा तो दिमाग सुन्न, लड़किया भी गजब होती हैं, दुनिया को बताएंगी उन्होंने छोड़ा और मिलने पे शिकायत की हमने छोड़ा।
चाय पीते-पीते मैंने पूछा, “इनके पापा कब आएंगे, सोच रहा हूँ उनसे मिल के जाऊं।” मेरे ऐसा कहते ही वो उदास हो गयी. पूछने पे उसने बताया की उसके बच्चों के पापा सिर्फ सप्ताह के अंत में एक रात के लिए आते हैं, बाकी दिन वो अपनी पहली पत्नी के पास रहते हैं. मुझे समझ में नहीं आ रहा था क्या बोलूं। फिर उसने बताया की पीएचडी के दौरान ही उसकी सरकारी नौकरी लग गयी और वहीँ ऑफिस में उसके रीजनल मैनेजर से उसको प्रेम हो गया. नीलू, ” हम एक हो चुके थे और मैंने एक दिन शादी को कहा क्यों की मैं गर्ववती हो चुकी थी. तब उन्होंने बोला की उनकी शादी हो चुकी हैं.” ओह! पीएचडी लैब और सरकारी दफ्तर में अगर कोई कुवारी लड़की घुसे तो वो फिर गृहणी बनके ही निकलती है.
मैंने कहा की फिर छोड़ दो उसको, वो तुम्हारा शोषण कर रहा है. नीलू, “नहीं, अब ये मेरे लिए पाप है की मैं किसी और मर्द के बारे में सोचूं भी. अब ये ही मेरी जिंदगी हैं. मैंने मन से उनको पति मना हैं और अब मैं किसी और के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकती।”
लौटते समय मैं वो पुरानी कहावत ” सौ चूहे खा के बिल्ली चली हज को” सोच रहा था. लडकियां भी गजब की है भारत की, प्रेम चाहे जितनों से, जितनी बार कर ले, जितना आधुनिक बन लें, पर शादी के बाद मारना चाहती है सीता-सावित्री ही बन कर.

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परमीत सिंह धुरंधर