माँ और माटी


माँ और माटी का महत्त्व अब जाके मैं समझ पाया। अब पता चला की क्यों महाराणा प्रताप लड़ गए माटी के लिए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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की जब तक हैं गुरु गोबिंद सिंह जी


भारत को जीत कर भी,
तुम कभी जीत नहीं पाओगे।
हम राजपूतों – जाट -मराठों को,
तुम कभी बाँध नहीं पाओगे।
तुम चाहे तोप बरसा लो,
या हमपे हाथी दौड़ा लो.
रणभूमि में तुम हमें,
कभी पछाड़ नहीं पाओगे।
तानसेन के छंदों पे,
जितना भी वीर बनले अकबर।
राणा की बरछी का,
सामना नहीं कर पाओगे।
सुन लो ए मुगलों,
चाहे भाइयों को भाई से लड़ा लो.
मगर कभी अकबर को ना,
रणभूमि में उतार पाओगे।
हम हारकर भी, झुक जाए,
मिट जाए, अगर किसी दिन.
पर सिक्खों की बस्ती में,
तुम लोहा ना उठा पाओगे।
की जब तक हैं गुरु गोबिंद सिंह जी,
ए मुगलों,
तुम कभी भारत न जीत पाओगे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे पूर्वजों की फितरत ही लुटाने की रही


मुझे राजपूत होने का गुमान नहीं,
पर क्या करें,
लहुँ की मेरे बस पहचान यह ही.
हर बार चाहता हूँ,
अपना ईमान बेंच दूँ.
पर एक आवाज आती है,
ये मेरा काम नहीं.
लोग कहते हैं की मैं अकड़ता बहुत हूँ,
मगर दोस्तों मैं पिघलता भी बहुत हूँ.
एक बार भी किसी ने चुम्मा है मेरा माथा,
हर बार रखा है,
फिर सर को उसके चरणों में वहीं।
आते हैं मुझे लूटने के सौ तरीके,
मगर क्या करें,
मेरे पूर्वजों की फितरत ही लुटाने की रही.
और जब तक महाराणा की साँसे हैं,
मेरे खडग को मेवाड़ में,
मुगलों का साया भी बर्दास्त नहीं.
मुझे राजपूत होने का गुमान नहीं,
पर क्या करें,
लहुँ की मेरे बस पहचान यह ही.

परमीत सिंह धुरंधर

अजबदेह – जोधाबाई


एक जोधा के प्रेम के,
हज़ार किस्से कहने वालों.
कभी अजबदेह के त्याग की,
एक कहानी तो गढ़ के देखो.
क्षत्राणी थी, अभिमानी थी,
अपने पति की प्राण-प्यारी थी.
जोधा ने जिसका त्याग किया,
चंद सोने – चाँदी की चाहत में.
अजबदेह ने शान राखी,
पुरखों के उस निशानी की.

परमीत सिंह धुरंधर

सौ बार लडुंगा हल्दीघाटी


सौ बार लडुंगा हल्दीघाटी,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।
जब तक चेतक का साथ रहेगा,
मुगलों से भिड़ता रहूँगा मैं।
गम नहीं मुझे अभावों का,
चाहे वन – वन, मैं फिरता रहूँ।
मिटाता रहूँगा मुगलों को,
जब तक निशाँ है धरती पे।
जो झुक गए राजपूत,
उनमे अपने पिता का खून नहीं।
जो टूट गए राजपूत,
उनको अपने खून पे यकीं नहीं।
लहराता रहेगा केसरिया,
जब तक राणा खड़ा मेवाड़ में।
सौ बार लडुंगा हल्दीघाटी,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।
जब तक चेतक का साथ रहेगा,
मुगलों से भिड़ता रहूँगा मैं।

परमीत सिंह धुरंधर

सौ बार लड़ूंगा हल्दीघाटी में


राते जितनी काली हो,
नशा उतना ही आता है मुझे,
दर्द जितना गहरा हो,
जीने में उतना ही मज़ा है मुझे।
सौ बार लड़ूंगा,
हल्दीघाटी की लड़ाई,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।
दिल्ली की रौनक मुबारक हो तुम्हे,
मेवाड़ की शान भाती है मुझे।
मैं राजपूत हूँ, कोई मुग़ल नहीं,
योवन की हर धारा तेरे लिए है,
माँ की गोद लुभाती है मुझे।
सौ बार लड़ूंगा,
हल्दीघाटी की लड़ाई,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

घास की रोटी


पकाया है तुमने तो,
घास की ये रोटी नही.
अपने हाथो से खिला दो,
फिर ऐसा जीवन नहीं.
कष्ट क्या है धुरंधर राणा को,
जब तक तुम्हारे नयनो में हूँ.
बाहों में सुलो लो अपने,
फिर ऐसी कोई महल नहीं.