लडकियां बन गयीं हैं बिल्ली


भारत की लडकियां,
बन गयीं हैं बिल्ली,
और लड़के, बंदर।
इस पवित्र आँगन में,
अब किसी अहिल्या के लिए,
कोई राम न बचा.
जिस्म के इस खेल में,
रह गए है बस ऋषि गौतम,
और देव इंदर।
अब द्रौपदी भी पुकारे,
को किसे ?
यहाँ तो भीम-अर्जुन,
भी टूटते हैं दुर्योधन सा जिस्म पे,
इन दीवारों के भीतर।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

आज अकेली पड़ गयी है, कंगना


भारत वर्ष जिसके आँगन में,
रविश कुमार, विनोद दुआ,
और लाखों नारी के अधिकार के लिए,
लड़ने वाले, वामपंथी, सेक्युलर हैं,
वहाँ, आज अकेली पड़ गयी है, कंगना।

भारत वर्ष, जहाँ हिन्दू धर्म, सवर्णों में,
हर पल नारी विरोधी कर्म, मर्म,
ढूंढने वाले,
सिंदूर, करवा चौथ को नारी के पावों की बेड़िया बताने वाले,
लाखों वामपंथी, सेक्युलर हैं,
वहाँ, आज अकेली पड़ गयी है, कंगना।

भारत बर्ष, जहाँ नारी से कैसे बाते करते है?
कैसे नारी का सम्मान करते है?
क्यों राम गलत थे जो सीता का त्याग किया?
जहाँ लाखों नारे लगाते हैं नारी की मुक्ति को,
जहाँ सलमान खान, शाहरुख खान और अक्षय कुमार,
रोज कहते हैं बात नारी सुरक्षा का,
जहाँ लाखों वामपंथी, सेक्युलर हैं,
वहाँ, आज अकेली पड़ गयी है, कंगना।

 

परमीत सिंह धुरंधर

Ego and Logic


If you cannot,
I cannot,
Because I am not that kind of man.
If you think
You are 100% correct.
I think too,
I am a genius.
If you cannot,
I cannot,
Because I am not that kind of man.
If you think
You are 100% logical.
I think too,
I am a champion philosopher.
So, if you cannot,
I cannot,
Because I am not that kind of man.

 

Parmit Singh Dhurandhar

हर स्तन शिशु का आहार नहीं होता


पाकर हुस्न को, इतराना छोड़ दो.
वफ़ा और हुस्न का, कभी साथ नहीं होता।
जितनी भी राते, चाहे साथ गुजार लो
ह्रदय में हुस्न के, कभी एक समय,
कोई एक नहीं होता।

वही मेनका, वो ही शकुंतला,
हर स्तन शिशु का आहार नहीं होता।
नस-नस में इनके मक्कारी है भरी,
इनके चेहरे से ये नकाब नहीं गिरता।
जब दिल टुटा मेरा तब मैंने जाना,
क्यों हुस्न पे किसी का एतबार नहीं होता?

 

परमीत सिंह धुरंधर