मेरा परुषार्थ असमर्थ है


देह की कामना,
देह को नहीं, मन को है.
देह की कामना,
देह से नहीं,
उसकी नग्नता, अर्ध-नग्नता से नहीं,
बल्कि उसपे चढ़े बस्त्रों से हैं.

देह की कामना,
सिर्फ शरीर, मांस, की नहीं,
उसकी अंगराई, हया, शर्म,
और उसकी साँसों के स्पंदन से है.
देह की कामना,
सिर्फ मुझपे जवानी आने,
और मेरी मर्दानगी के आभास से नहीं,
उसके नयनों की चंचलता,
अधरों की कपकपाहट,
कमर की लचक से है.

देह की कामना,
सिर्फ दृष्टि से परिभाषित नहीं,
देह की कामना,
स्वयं नारी के वक्षों, नितम्बों,
और उसके मादक लावायण्य,
विशाल, विकसित यौवन से,
संचालित है.

अतः मैं मिलना चाहता हूँ,
जानना चाहता हूँ, उन लोगो से,
जो ऐसे कामना को,
निरीह बच्चियों,
अर्ध-नग्न, नग्न स्त्रियों में देख लेते हैं.
वो उनकी सुंदरता,
उनके श्रृंगार की तुलना,
कैसे और किससे करते है?

मैं देखना चाहता हूँ,
समझना चाहता हूँ,
उनके ख़्वाबों, मेरे खवाबों की नारी के अंतर को,
उसके अंगों, वक्षों, हया और लावण्या के अंतर को.

शायद, अब देह की कामना,
नारी की लालसा,
सौंदर्य, रूप, अंग, मादकता से नहीं,
बस इससे है की,
वो सिर्फ एक नारी, मादा या लड़की है.

शायद, अब देह की कामना,
उसके अधरों, उसके नयनों, उसके जुल्फों से नहीं,
बस इससे है की,
वो यौन क्रिया को पूर्ण कर सकती है.

मेरी कलम अब भी,
असमर्थ है उस नारी जिस्म की कल्पना में,
जो वक्ष-विहीन, लावण्या – हीन,
अर्ध-नग्न या नग्न बस एक जिस्म हो.
और मेरा परुषार्थ भी असमर्थ है,
इस लालसा, देह की कामना,
को मुझमे जागृत करने,
और मुझे वासना से बसीभूत करने को.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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कमर पे चोटी लटके, वीणा में तार जैसे to वेणी उसके नितम्बों पे, सम्मोहन का मोहनी बाण लिए : A tribute to my father


It is a rare combination that a father – son pair has same passion or interest until it comes to politics, business and film industry.
When I was in high school, one day, I told my father, “I don’t have any quality whereas my friends are so much talented, smart and handsome. I feel bad.” My father in his characteristic smile narrated two of his poems and taught me how to write poems. It was first time he explained me the meaning of love and beauty by just telling his two lines (“वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान.”) of his poem that he wrote during his school life. He had not remembered the whole poem nor he had saved any of his poems by writing. By his second poem, he taught me to write on girl. The lines from his second poem are:
मुख मोड़ कर खड़ी है, समझाऊं कैसे?
दिल तोड़ कर खड़ी हैं, मनाऊं कैसे?
कमर पे चोटी लटके, वीणा में तार जैसे।
बीच में लक्ष्मण रेखा पड़ी है, पास जाऊं कैसे।
(https://hotcrassa.wordpress.com/2017/09/17/%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%a3%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a5%87/)
Later, to pay my tribute to him, I used his lines “ वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान” and made a full poem.
वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।
तेरे ही योवन पे, जी रहा है किसान।
जब- जब तेरे ह्रदय पे, किया है मैंने प्रहार,
तूने अपनी ममता से, भर दिया है मेरा खलिहान।
वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।
तेरी ही अंगराई से, है मेरे मूछों का अभिमान।
जब-जब आया हूँ दर पे तेरे, मैं भूखा, खाली हाँथ,
तूने लूटा कर खुद को, भर दिया है मेरा आँगन और बथान।
वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।
तेरे ही आँचल में, मुस्काता है परमीत इंसान।
(https://hotcrassa.wordpress.com/2014/04/11/%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a4%ae-%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a8/)
However, I always wanted to write something on girl by keeping his style and view and just by changing words. I used his lines “कमर पे चोटी लटके, वीणा में तार जैसे।” and wrote “वेणी उसके नितम्बों पे, सम्मोहन का मोहनी बाण लिए ” in my recently written poem which has following lines:
समीकरण बदल रहें है भूमण्डल के, पुष्पित – पुलकित उसके यौवन से.
दो नयन, इतने उसके निपुण, कण – कण में रण के,
क्षण – क्षण में, हर इक पल में. पूरब – पश्चिम, उत्तर – दक्षिण में,
तैर रहे हैं तीर, उसके तरकश के.
कट रहे, मिट रहे, कोई अर्जुन नहीं, अब कोई कर्ण नहीं।
सब जयदर्थ सा छिप रहे, भय लिए मन में.
अधरों पे मुस्कान लिए, वक्षों पे गुमान लिए.
वेणी उसके नितम्बों पे, सम्मोहन का मोहनी बाण लिए.
आतुर हो, व्याकुल हो, सब चरण में उसके,
सब शरण में उसके, गिड़ रहे, पड़ रहे.
आखों की आतुरता, मन की व्याकुलता,
देख पौरष की ऐसी विवशता।
देव – दानव – मानव, पशु – पक्षी,
स्वयं ब्रह्मलोक में ब्रह्मा भी,
रच रहे हैं श्लोक उसके रूप के गुणगान में.
(https://hotcrassa.wordpress.com/2017/09/13/%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%a3%e0%a5%80-%e0%a4%89%e0%a4%b8%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d/)
This is my tribute to him as a father, as a friend and as a teacher, who taught me writing. At that time, I did not understand why he wanted me to develop skills in writing. However, now, I see this as a boon or best gift from him to live life during difficult phase.

 

Parmit Singh Dhurandhar

 

Had Adi Shankara an idea of modern Pakistan and Bangladesh?


In his life, Adi Shankara travelled within Indian subcontinent to teach the philosophy of Advaita Vedanta. He even went to Benaras and then Mithilanchal (Bihar) to defeat Mandal Mishra. Adi Shankara established four mathas at Davarka, Jagnaath Puri in Orissa, Sringeri in Karnatka and in Badrinaath in Utrakhand. Even if there is debate whether he established these mathas or inherited from others, there are no sources claiming he tired to establish or inherit any such mathas in the area of modern Pakistan, Bangladesh, and any other part of old India. During his time (8th century CE), Arab had reached and established in Sindh, but still these regions were ruled by Rajput (the Soomra dynasty 1024-1351) for along time. Even Mahmud of Ghazni defeated the Kabul Sahi dynasty in 1011 CE. Therefore, it is surprising that why Adi Shankara did not travel to the modern Pakistan or Bangladesh to establish such Mathas even if there are 5 Shakti Pithas in Bangladesh, 3 in Nepal, one in Pakistand, one in Tibbet and one in Srilanka.
So, it suggests that Adi Shankara had an idea of the division of India into modern India, Pakistan and Bangladesh.

 

Parmit Singh Dhurandhar

लडकियां बन गयीं हैं बिल्ली


भारत की लडकियां,
बन गयीं हैं बिल्ली,
और लड़के, बंदर।
इस पवित्र आँगन में,
अब किसी अहिल्या के लिए,
कोई राम न बचा.
जिस्म के इस खेल में,
रह गए है बस ऋषि गौतम,
और देव इंदर।
अब द्रौपदी भी पुकारे,
को किसे ?
यहाँ तो भीम-अर्जुन,
भी टूटते हैं दुर्योधन सा जिस्म पे,
इन दीवारों के भीतर।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

आज अकेली पड़ गयी है, कंगना


भारत वर्ष जिसके आँगन में,
रविश कुमार, विनोद दुआ,
और लाखों नारी के अधिकार के लिए,
लड़ने वाले, वामपंथी, सेक्युलर हैं,
वहाँ, आज अकेली पड़ गयी है, कंगना।

भारत वर्ष, जहाँ हिन्दू धर्म, सवर्णों में,
हर पल नारी विरोधी कर्म, मर्म,
ढूंढने वाले,
सिंदूर, करवा चौथ को नारी के पावों की बेड़िया बताने वाले,
लाखों वामपंथी, सेक्युलर हैं,
वहाँ, आज अकेली पड़ गयी है, कंगना।

भारत बर्ष, जहाँ नारी से कैसे बाते करते है?
कैसे नारी का सम्मान करते है?
क्यों राम गलत थे जो सीता का त्याग किया?
जहाँ लाखों नारे लगाते हैं नारी की मुक्ति को,
जहाँ सलमान खान, शाहरुख खान और अक्षय कुमार,
रोज कहते हैं बात नारी सुरक्षा का,
जहाँ लाखों वामपंथी, सेक्युलर हैं,
वहाँ, आज अकेली पड़ गयी है, कंगना।

 

परमीत सिंह धुरंधर