धर्म


बात – बात में खून बहाते हो,
चाँद लकीरों के नाम पे.
मेरा तो धर्म, मजहब, ईमान,
सब वहाँ है,
जहाँ वो अपने केसुओं को बिछा दें.
सबसे बड़ा धर्म माँ की गोद,
सबसे बड़ी इबादत,
महबूब की आगोश है.
इसके मिलने पे,
जन्नत-जहन्नुम का भेद मिट जाता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

धर्म


सर्द रातों में जब जिस्म कराहता है,
तो गोरे-काले में भेद मिट जाता है.
और जब अतड़िया पिसती हैं भूख से,
तो मंदिर-मस्जिद में भेद मिट जाता है.
बच्चा ढूंढता है बस माँ का स्तन, तब
पशु और इंसान में भेद मिट जाता है.
धर्म और मजहब की लकीर ढूढ़ने वालो,
जब मौत आती है,
गिद्ध नाचने लगते हैं,
तो धर्म का हर भेद मिट जाता है.

परमीत सिंह धुरंधर