राणा सांगा


सरे आम बेबसी का रोना ही क्या,
जब जंग होगी तो अंगों का खोना ही क्या।
जब तक प्राण हैं, भींचता रहूँगा तलवारों को,
बिना हरे जख्मों के सांगा की जवानी ही क्या।
लड़ूंगा, लड़ता रहूँगा,
इन बालू के कणों को लहूँ से सींचूंगा।
कुछ उगे या न उगे इस धरती से,
पर बिना परिश्रम के फसलों का लहलहाना ही क्या।

परमीत सिंह धुरंधर

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