गरीबी में भी गुरुर रखती हैं


वो अपनी बाहों में समंदर रखती हैं.
तभी तो इस गरीबी में भी गुरुर रखती हैं.

ना जिस्म पे सोने – चांदी के गहने
ना लाखों – हजारों का श्रृंगार ना कपड़े
मगर राजा, रंक सभी नज़ारे गराये हैं उसपे
जाने क्या?
मैंले – कुचले, फटे – चिथड़े
अपने दुप्पटे में वो रखती है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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गरीब


इतना गरीब हूँ मैं,
इतना गरीब हूँ।
मुझे कोई ख़्वाब नहीं,
मैं बेबस हूँ, लाचार,
मुझे उनसे प्यार नहीं।
सोच-सोच के आती है नींदे,
और ओस की बूंदों सी उड़ जाती है।
लेटे-लेटे चारपाई पे मैं,
बस तारे गिनता हूँ।
इतना गरीब हूँ मैं,
बस पानी पीता हूँ।
मुझे कोई ख़्वाब नहीं,
मुझे उनसे प्यार नहीं।
वो ढूंढे सोना -चांदी,
मेरे तन पे कपड़े नहीं।
उनके आँखों में हज़ार सपने,
मेरा कोई ठौर नहीं।
वो रातों को भी हंसती हैं।
मैं दिन में भी शांत बैठता हूँ।
इतना गरीब हूँ मैं,
पुवाल पे सोता हूँ।
मुझे कोई ख़्वाब नहीं,
मुझे उनसे प्यार नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर