पाप और पुण्य


पाप दो तरह से करते हैं. एक जवानी में पाप करके बुढ़ापे में सुधार कर लेते है. ये लोग उच्च कोटि के होते हैं, जैसे वाल्मीकि, रावण, दुर्योधन, अंगुलिमाल डाकू, नरेंद्र मोदी और अरविन्द केजरीवाल। दूसरा तरीका होता है पूरी जिंदगी अच्छे रह के बाद में, बुढ़ापे में फंस जाते हैं इस रोग में और मज़ा भी आता है अपने पुण्यों को क्षीण-क्षीण होते देख के. जिद रहती है की हमारे हैं, लूटने दो. मिथ्या पाल लेते हैं की हम ही सर्वश्रेष्ठ। ऐसे लोग ऊचाई से गिरते – गिरते, पतन की उस पेंदी तक जाते हैं जहाँ से कोई पुण्य करने पे भी पुण्य नहीं मिलता। इसे दाग लगा देना कहते हैं. इसलिए पहले के लोग इस तरह का काम होने के बाद आत्मगलानी में या तो घर- संसार छोड़ देते थे या आत्महत्या करते थे या आत्मशुद्धि के लिए प्रयाग जाते थे. ऐसे लोगो की श्रेणी में भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, अश्वथामा, देवगौड़ा, वी. पी सिंह और नितीश कुमार आते हैं.
आज सारे बुद्धिजीवी लोग दूसरी श्रेणी की महिमा करें में लगे है. पहले के समय में लोग प्रथम श्रेणी के लोगो की महिमा ज्यदा करते थे. हाँ, एक बात कहना भूल गया की एक तीसरी श्रेणी होती है जिसमे सिर्फ एक ही व्यक्ति हुआ, विश्वामित्र, जिसने पाप, पुण्य, फिर पाप करने के बाद फिर पुण्य अर्जित किया.

परमीत सिंह धुरंधर

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