फितरत


कहती है दरिया उछाल कर,
किनारों के टूटने में हैं आनंद.
कब तक मुझे बांधोगे,
अपने बंधन में यूँ रख कर.
कहती है दरिया उछाल कर,
कहती है दरिया उछाल कर.
आई हूँ मैं इठलाकर,
जाऊंगीं मैं बलखाकर.
मेरी तो ये ही फितरत है,
सब कुछ ले जाऊंगीं बहाकर.
कहती है दरिया उछाल कर,
कहती है दरिया उछाल कर.

परमीत सिंह धुरंधर

प्रकृति


सूर्य कहते हैं,
प्रखर बनो.
हवा कहती है,
बहते रहो.
नदिया कहती है,
जोश से जियो.
और किनारें कहते हैं,
प्रेम में टूट चलो.
वृक्ष कहते हैं,
सदा ऊपर उठो.
कलियाँ कहती है,
खिलते रहो.
फूल कहते हैं,
समाज को,
सुगन्धित करो.
और भौरें कहते हैं,
विचरते रहो.
लहरें कहती हैं,
उछल कर वार करो.
चाँद कहता है,
शीतल बनो.
अग्नि कहती है,
खुद पहले जलो.
और बादल कहते हैं,
बरसने में ना,
भेद करो.
रात कहती है,
दीपक बनो.
दिया कहता है,
पथ प्रदर्शित करो.
पत्थर कहते हैं,
स्थिर रहो.
और राहें कहती है,
मंजिल की तरफ,
बढ़ते रहो.
उषा कहती है,
श्रम करो.
साँझ कहती है,
मनन करो.
फल कहते हैं,
मिठाश बांटों.
और काटें कहते हैं,
स्वीकार करो.
दर्पण कहता है,
सत्य समझों।
जीवन कहता है,
समय का मान करो.
समय कहता है,
त्याग करो.
और मोह कहता है,
बलिदान करो.

परमीत सिंह धुरंधर