सौ बार लडुंगा हल्दीघाटी


सौ बार लडुंगा हल्दीघाटी,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।
जब तक चेतक का साथ रहेगा,
मुगलों से भिड़ता रहूँगा मैं।
गम नहीं मुझे अभावों का,
चाहे वन – वन, मैं फिरता रहूँ।
मिटाता रहूँगा मुगलों को,
जब तक निशाँ है धरती पे।
जो झुक गए राजपूत,
उनमे अपने पिता का खून नहीं।
जो टूट गए राजपूत,
उनको अपने खून पे यकीं नहीं।
लहराता रहेगा केसरिया,
जब तक राणा खड़ा मेवाड़ में।
सौ बार लडुंगा हल्दीघाटी,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।
जब तक चेतक का साथ रहेगा,
मुगलों से भिड़ता रहूँगा मैं।

परमीत सिंह धुरंधर

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