माँ औलादें पाल ही लेतीं है


माँ
औलादें पाल ही लेतीं हैं
चाहे परिस्तिथियाँ कैसे भी हो.
माँ चाहे बूढी हो
झुकी कमर हो
हड्डियों में बुढ़ापे का दर्द
और ठण्ड का असर हो
पर खिसक – खिसक कर
चूल्हे में आग डाल ही देती है.
माँ
औलादें पाल ही लेतीं है.

सुख से, दुःख से
हंस कर या रो कर
अपने – पराये सबसे लड़कर
माँ अकेले, जूझते हुए
वक्त के हर सितम को सहकर
अपने बच्चों को बड़ा कर ही देती है.
माँ
औलादें पाल ही लेतीं हैं.

जब सबकी आँखों में निंद्रा का यौवन हो
और नशों में आलस्य की मदिरा हो
सूरज भी जब ना निकल सके
उन गहन अंधेरो को चीरकर
थकान से टूटते जिस्म में
माँ स्फूर्ति भर ही लेती है.
माँ
औलादें पाल ही लेतीं हैं.

अपनी भूख दबाकर
अपनी अभिलाषाओं का दमन कर
मैली – कुचैली, फटी साड़ी में भी मुस्कराकर
चार दीवारों में बंध कर
सिमटी जिंदगी के बावजूद
हर पल उल्लास से भरकर
अपने बच्चों के लिए
रात – दिन, दोपहर
माँ रोटी सेंक ही देती है.
माँ
औलादें पाल ही लेतीं हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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माँ


माँ एक शब्द नहीं,
संसार है.
माँ सिर्फ धन नहीं,
कल्पवृक्ष, धेनुगाय है.
माँ सागर सी गहरी नहीं,
बल्कि अनंत हैं.
माँ ब्रह्मा, विष्णु, महेश नहीं,
गंगा, सरस्वती भी है.
माँ सिर्फ साकार एक तन नहीं,
निराकार सम्पूर्ण ब्रह्म है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ तुम देवों की देव हो


माँ तुमसे मिलना मेरा, जीवन का एक अद्भुत क्षण है.
माँ तुम देवों की देव हो, आँचल तुम्हारा मेरा परम धाम है.
जब तुम ही हो मेरे साथ, किसको पूजूँ, किसको धयाऊं?
पुत्र ही जब तुम्हारा हूँ, फिर और क्या पुण्य कमाऊं?
बस तुम्हारा आशीष ही माँ, मेरा ब्रह्मास्त्र, मेरा कवच – कुंडल है.
माँ तुमसे मिलना मेरा, जीवन का एक अद्भुत क्षण है.
माँ तुम देवों की देव हो, आँचल तुम्हारा मेरा परम धाम है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ की रोटियां


जवानी का खेल है,
किसी के इश्क़ में रोना।
बुढ़ापे के आंसू तो बस, निकलते है,
याद कर माँ की लोरियाँ।
आसान नहीं,
हाथों को जला कर सेकना रोटियां।
समजह्ते हैं ये तब,जब थाली में,
पड़ती हैं जाली-भुनी रोटियां।
जावानी का खेल है,
सितारों में चाँद का देखना,
बुढ़ापे में तो,
चाँद-तारों,सबमे दिखती हैं,
बस माँ की ही रोटियां।
यूँ उम्र गुजार दी,
जिसे पाने को.
उसे पाकर, याद आती हैं,
बस माँ की रोटियां।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

ना चरण – स्पर्श करों


ना प्रेम करों,
ना उपहास करों।
नारी तो देवी है,
पर,
ना चरण – स्पर्श करों।
ये तो माँ का सम्मान है,
ना माँ का नारी से तुलना करों।
माँ तो शक्ति हैं, माँ तो सत्य हैं,
माँ साक्षात् ब्रह्म है,
बस माँ का ही बंदन करों।

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ और मास्टर जी


माँ तो दबंग है,
माँ तो दबंग है,
मास्टर जी.
कहती है, खा लो,
थोड़ा तो खा लो.
छोड़ो पढाई,
मास्टर जी.
चाहे आँगन में,
या रहूँ बथान में.
आ जाती है,
लेके पकवान हाथ में.
फिर कैसे मैं पढूं?
क्या करूँ पढाई?
मास्टर जी.
मास्टर जी भी कांप गए,
लेके छड़ी हाथ में.
बोले, कोई बात नहीं बेटा,
माँ तो सर्वोपरि है.
खा – खा के करो पढाई।

 

परमीत सिंह धुरंधर

दबंग माँ


माँ लड़ जाए,
माँ भीड़ जाए.
कुछ नहीं समझती किसी को.
क्या गली, क्या मोहल्ले वाले?
अपने बच्चे की खातिर,
माँ,
क्या बुझती अपने पति को?
माँ चूल्हे पे हो,
या आँखे नींद में.
रूह तो भागती है, माँ की,
बस बच्चे के पीछे -पीछे।
अरे मास्टर जी भी डरते हैं,
कान पकड़ने से.
कहीं ज्यादा लाल हो गया तो,
सुननी पड़ेगी उन्हें दिन भर माँ से.
माँ कट जाए,
माँ मिट जाए.
अरे काट डाले माँ किसी को.
क्या गली, क्या मोहल्ले वाले?
अपने बच्चे की खातिर,
माँ,
क्या बुझती अपने पति को?

 

परमीत सिंह धुरंधर

Mother can do anything for her child. You can not explain that by any science.

#Respect_Mom_and_Not_Religion