मेरी नजर में तू एक गुनाहगार दिखता है


तेरा हर रिश्ता,
मुझे रात के अंधेरों में,
किया हुआ एक गुनाह लगता है.
जमाना तुम्हे चाहे जो कहे,
मान ले, लिख दे,
या समझ के समझाने लगे.
मेरी नजर में तू हमेशा,
एक गुनाहगार दिखता है.
तू जो हर किस्सा बेचता है,
डमरुं के ताल पे.
जो अपने ख़्वाबों के,
अधीन हो के विवश हैं,
उनको नचाता हैं,
तू अपने धुन पे.
गर्वान्वित हो कर,
चाहे तू खुद को चाहे जितना भी महान,
मानता है.
मेरी नजर में तू आज भी, तब भी,
एक गुनाहगार दिखता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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