मैं त्रिलोक बदल दूंगा


मैं अंदाज बदल दूंगा,
परिणाम बदल दूंगा।
होगा अगर कोई रण यहाँ,
तो धरती क्या?
मैं आसमान बदल दूंगा।
क्यों चिंतित हो पिता?
तात श्री के ज्ञान से.
अगर राम, नारायण भी हैं तो,
मैं अपनी तीरों से त्रिलोक बदल दूंगा।
मैं यूँ ही इंद्रजीत नहीं,
मुझे त्रिलोक के सुख की चाह नहीं।
बस आपके जय-जयकार के लिए,
पिता श्री,
मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड बदल दूंगा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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मैं मेघनाथ हूँ


मैं मेघनाथ हूँ, मेघनाथ,
पुरे ब्रह्माण्ड में,
कोई नहीं जो मुझे रोक सके.
मैं जब रथ पे होता हूँ,
विराजमान, सारे जहाँ में,
कोई नहीं जो मेरे अश्वो को बाँध सके.
मैं पल में पताका फहरा दूँ,
त्रिलोक में कहीं भी.
मुझसे कोई नहीं छुप सकता,
पुरे ब्रह्माण्ड में कहीं भी.
मैं जब करता हूँ तीरों का संधान,
ऐसा शक्तिमान कोई नहीं रण में,
जो मेरे भीषण प्रहरों से बच सके.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तुम अपनी वेणी में मेरे पुष्प तो लगा के देखो


मैं भीषण तीरों से बाँध दूंगा,
शेषनाग के फनों को.
तुम एक बार तो हमसे,
प्रेम कर के देखो।
मैं इंद्रा को हराकर भी,
अधूरा हूँ तुम बिन.
तुम एक बार अपने नैनों,
के बाण चला के तो देखो।
मेरा तुमसे हैं वादा ए देवी,
तुम यूँ ना अधीर हो.
मैं असुर भले ही हूँ मगर,
मृत्यु तक एक-भार्या नियम में बधूंगा।
तुम अपने मधुर अधरों से,
मुझे प्राणनाथ कह के तो देखो।
ऐसी कोई शक्ति नहीं सृष्टि में,
जो तोड़ सके तुमसे मेरे प्रेम को.
ऐसी कोई अप्सरा भी ना होगी,
जो अब मोह सके इस मन को.
तुम अपनी वेणी में,
मेरे पुष्प तो लगा के देखो।
मैं तुम्हारी लिए,
शिव – विष्णु समस्त, साक्षात परम ब्रह्म,
से टकरा जाऊं।
मैं अपने भीषण बल से,
एक पल में, समस्त क्षीर – सागर सुखा दूँ.
तुम एक बार ह्रदय से अपने भय मिटा के,
मेरे अंक-पास में आके तो देखो।

 

परमीत सिंह धुरंधर

This is based on the first love story of the universe: Meghnaath and Sulochana.