मीरा के मोहन


तुम्हारी नजर के हैं दीवाने सभी,
मेरी हर नजर में तुम्हीं हो तुम्हीं।
रुस्वा करो, तनहा रखो,
शिकवा कोई, कभी ना, कहीं।
अब इस जिंदगी में बस तुम्हीं हो तुम्हीं।
धूल में रहूँ, काँटों में रहूँ,
मुस्कराती रहूंगी, बस अपने चरण में रखो.
इस मीरा के अब मोहन तुम्हीं, तुम्हीं हो तुम्हीं।
एक विष सा है, ये सम्पूर्ण जीवन मेरा,
बनके प्रभु, अब इसकी लाज रखो.
हर अग्नि-परीक्षा, हंस कर दे दूंगी,
आजीवन, बस, तुम मेरे, केवल मेरे ही रहो.
की इस अबला सीता के,
अब राम बस, तुम्हीं हो तुम्हीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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मीरा


मुझे श्याम ऐसा मिला,
मैं राम भूल गयी.
मन तो मेरा सीता सा,
पर तन से मीरा बन गयी.
धागों के रिश्ते नहीं बाँध सके,
मेरे पावों को.
मैं हर रिश्ता छोड़ के,
जोगन बन गयी.

परमीत सिंह धुरंधर

मीरा


कहाँ मेरे कान्हा,
कहाँ हो कन्हैया,
प्यासी मेरी धरती,
प्यासी हैं मीरा।
गैयन के संग,
मैं भी,
उदाश हूँ खड़ी।
सुनी इस बगिया में,
कहाँ हैं बंसी तेरी।
कहाँ मेरे बंधू,
कहाँ हो कन्हैया,
प्यासी मेरी धरती,
प्यासी हैं मीरा।
चादर भी तन से,
गिरा के मैं हूँ आयी,
पयाल भी पथ में,
कही टूट गयी मेरी।
कांटो से छलनी,
है पग मेरे,
फिर भी आँखों में,
प्रेम छलकाती हूँ आयी।
कहाँ मेरे सखा,
कहाँ हो रचैया,
प्यासी मेरी धरती,
प्यासी हैं मीरा।
दो पल जरा नैनों,
से मेरे पी लो,
दो पल जरा,
बंसी तो बजा दो.
लोक-लाज, शर्म-भय,
सब।
बहती गंगा में,
बहा के हूँ आयी.
कहाँ मेरे प्रेमी,
कहाँ हो रसैया,परमीत
प्यासी मेरी धरती,
प्यासी हैं मीरा।