शिव -सा – धुरंधर


शिव-शंकर बोले हमसे,
तुम मेरे प्रिये हो.
फिर क्यों डरते हो इतना,
क्यों भय से बंधे हो?
ये आँखे है तुमपे सदा,
सर्वदा, तुम्ही इनको प्यारे हो.
धन की तमन्ना,
नारी की कामना।
ना रखो मन में,
ये ही है वेदना।
की तुम मेरा अंश हो,
तुम मेरा तेज हो.
फिर क्यों डरते हो इतना,
क्यों भय से बंधे हो?
भटकना है तुम्हे,
बहना है तुम्हे, हर पल में निरंतर-2।
ना कोई बाँध सकेगा,
ना कोई दल सकेगा।
बस तुम्ही हो केवल,
इस जग में शिव -सा – धुरंधर-2।
तुम ही रूद्र हो,
तुम ही मेरा जोत हो.
फिर क्यों डरते हो इतना,
क्यों भय से बंधे हो?

 

परमीत सिंह धुरंधर

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