मेरे माँ की दुआओं का दौर है


सितारों से कह दो
ये रहनुमाओं का दौर है.
तन्हा हूँ मैं यहाँ
मगर ये मेरे इरादों का दौर है.

मिटना मेरे नसीब में तय है
मगर मिटने से पहले
ये मेरे हौसलों का दौर है.

मेरी बुलंदियों को किसी की
ताबीज नहीं चाहिए।
मेरे सर पे मेरी माँ का हाथ है.
जब तक खड़ा हूँ यहाँ
तो समझों की
मेरे माँ की दुआओं का दौर है.

परमीत सिंह धुरंधर

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माँ औलादें पाल ही लेतीं है


माँ
औलादें पाल ही लेतीं हैं
चाहे परिस्तिथियाँ कैसे भी हो.
माँ चाहे बूढी हो
झुकी कमर हो
हड्डियों में बुढ़ापे का दर्द
और ठण्ड का असर हो
पर खिसक – खिसक कर
चूल्हे में आग डाल ही देती है.
माँ
औलादें पाल ही लेतीं है.

सुख से, दुःख से
हंस कर या रो कर
अपने – पराये सबसे लड़कर
माँ अकेले, जूझते हुए
वक्त के हर सितम को सहकर
अपने बच्चों को बड़ा कर ही देती है.
माँ
औलादें पाल ही लेतीं हैं.

जब सबकी आँखों में निंद्रा का यौवन हो
और नशों में आलस्य की मदिरा हो
सूरज भी जब ना निकल सके
उन गहन अंधेरो को चीरकर
थकान से टूटते जिस्म में
माँ स्फूर्ति भर ही लेती है.
माँ
औलादें पाल ही लेतीं हैं.

अपनी भूख दबाकर
अपनी अभिलाषाओं का दमन कर
मैली – कुचैली, फटी साड़ी में भी मुस्कराकर
चार दीवारों में बंध कर
सिमटी जिंदगी के बावजूद
हर पल उल्लास से भरकर
अपने बच्चों के लिए
रात – दिन, दोपहर
माँ रोटी सेंक ही देती है.
माँ
औलादें पाल ही लेतीं हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


माँ एक शब्द नहीं,
संसार है.
माँ सिर्फ धन नहीं,
कल्पवृक्ष, धेनुगाय है.
माँ सागर सी गहरी नहीं,
बल्कि अनंत हैं.
माँ ब्रह्मा, विष्णु, महेश नहीं,
गंगा, सरस्वती भी है.
माँ सिर्फ साकार एक तन नहीं,
निराकार सम्पूर्ण ब्रह्म है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरी माँ से मधुर, जग में कुछ भी नहीं


mom

मेरी माँ से मधुर, जग में कुछ भी नहीं।
मेरे पिता से चतुर, जग में कोई नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा प्रबल,
विकट – विरल, इस धरा पे कोई नहीं।

मेरी माँ से निर्मल, कोई गंगा नहीं,
मेरे पिता से प्रखर कोई सूर्य नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा अहंकारी,
अभिमानी, उन्मादी, उस सृस्टि में कोई नहीं।

मेरी माँ से सुन्दर, इस ब्रह्माण्ड में कोई नहीं।
मेरे पिता से तेजस्वी, इस त्रिलोक में कोई नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा धुरंधर,
भयंकर, और विशाल समुन्दर, कोई नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

थालियाँ रुलायेंगी


इश्क़ मत करिये,
नहीं तो तन्हाईयाँ रुलायेंगी।

पिता को मत छोड़िये,
वरना रुस्वाइयाँ रुलायेंगी।

माँ को मत छोडो,
वरना थालियाँ रुलायेंगी।

भाई अगर साथ ना हो,
तो खुशियाँ रुलायेंगी।

और बहन को मत भूलों,
वरना सुनी कलाइयाँ रुलायेंगी।

और इन सबको छोड़ देता है,
उसको तो जिंदगी रुलायेगी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

तो श्रवण बन जाओ


सरसों के खेतों में संस्कार नहीं मिलते,
आम के बगीचों में पुरस्कार नहीं मिलते।
समझना है अगर खुद को और पाना है रब को,
तो फ़कीर बन जाओ.
यहाँ यशोधरा तो मिलती हैं महलों में,
पर बुध नहीं मिलते।

किस्मत, कुँवारी किसी की नहीं,
दुल्हन में समझदारी, किसी की नहीं।
पाना है अगर सच्ची मोहब्बत,
तो श्रवण बन जाओ.
पैसा और वक्त, यहाँ, मित्र, शत्रु, पत्नी,
क्या – क्या नहीं बदल जाते।
बस एक माँ को नहीं बदल पाते।

 

परमीत सिंह धुरंधर

चाँद यूँ ही मुझसे खफा नहीं रहता


चाँद यूँ ही मुझसे खफा नहीं रहता,
उसे पता है की मेरी माँ का आँचल ही मेरा आसमा है.
वो यूँ ही नहीं गिनाता है,
रह – रह कर मेरे नाम को जाहिँलों में,
उसे पता है की ये शख्श आज भी माँ का दुलारा है।

 

परमीत सिंह धुरंधर