तो श्रवण बन जाओ


सरसों के खेतों में संस्कार नहीं मिलते,
आम के बगीचों में पुरस्कार नहीं मिलते।
समझना है अगर खुद को और पाना है रब को,
तो फ़कीर बन जाओ.
यहाँ यशोधरा तो मिलती हैं महलों में,
पर बुध नहीं मिलते।

किस्मत, कुँवारी किसी की नहीं,
दुल्हन में समझदारी, किसी की नहीं।
पाना है अगर सच्ची मोहब्बत,
तो श्रवण बन जाओ.
पैसा और वक्त, यहाँ, मित्र, शत्रु, पत्नी,
क्या – क्या नहीं बदल जाते।
बस एक माँ को नहीं बदल पाते।

 

परमीत सिंह धुरंधर

चाँद यूँ ही मुझसे खफा नहीं रहता


चाँद यूँ ही मुझसे खफा नहीं रहता,
उसे पता है की मेरी माँ का आँचल ही मेरा आसमा है.
वो यूँ ही नहीं गिनाता है,
रह – रह कर मेरे नाम को जाहिँलों में,
उसे पता है की ये शख्श आज भी माँ का दुलारा है।

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ तुम देवों की देव हो


माँ तुमसे मिलना मेरा, जीवन का एक अद्भुत क्षण है.
माँ तुम देवों की देव हो, आँचल तुम्हारा मेरा परम धाम है.
जब तुम ही हो मेरे साथ, किसको पूजूँ, किसको धयाऊं?
पुत्र ही जब तुम्हारा हूँ, फिर और क्या पुण्य कमाऊं?
बस तुम्हारा आशीष ही माँ, मेरा ब्रह्मास्त्र, मेरा कवच – कुंडल है.
माँ तुमसे मिलना मेरा, जीवन का एक अद्भुत क्षण है.
माँ तुम देवों की देव हो, आँचल तुम्हारा मेरा परम धाम है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


ज़माने भर की दौलत कमा कर भी,
एक प्यास नहीं मिटती।
खूबसूरत जिस्म को पाकर,
रातें तो काट जाती हैं.
मगर अपनी मिटटी की सरहदों से दूर,
वो मीठी नींदें नहीं मिलती।
किस्मत में सबकुछ पाकर भी,
कितना तरपता हूँ माँ तेरे लिए.
की आज भी मेरी थाली की रोटियों में,
वो खुश्बूं तेरे हाथों की,
और वो स्वाद नहीं मिलती।

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ की रोटियां


जवानी का खेल है,
किसी के इश्क़ में रोना।
बुढ़ापे के आंसू तो बस, निकलते है,
याद कर माँ की लोरियाँ।
आसान नहीं,
हाथों को जला कर सेकना रोटियां।
समजह्ते हैं ये तब,जब थाली में,
पड़ती हैं जाली-भुनी रोटियां।
जावानी का खेल है,
सितारों में चाँद का देखना,
बुढ़ापे में तो,
चाँद-तारों,सबमे दिखती हैं,
बस माँ की ही रोटियां।
यूँ उम्र गुजार दी,
जिसे पाने को.
उसे पाकर, याद आती हैं,
बस माँ की रोटियां।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

माँ


शरीर कितना भी थक जाए माँ का,
मन नहीं थकता।
पुत्र अगर समीप हो तो,
घर का चूल्हा कभी नहीं बुझता।
जो भी चाहो, जब भी चाहो,
पक कर गर्म थाली में मिलता।
शरीर कितना भी थक जाए माँ का,
मन नहीं थकता।

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ की नयी सहेली


माँ, देखो कैसे,
अपनी बच्ची की जुल्फों में,
कंघी फेर रही है.
माँ, देखो कैसे,
अपनी बच्ची को सजा रही है.
माँ, भूल गयी है खाना,
माँ, भूल गयी है पीना।
जब से माँ के जीवन में,
एक बच्ची आयी है.
हाथों के जलने का,
अब पता नहीं चलता।
ना सांझ के ढलने पे,
किसी के आने का इंतज़ार ही रहता।
माँ, फिर से हो गयी है ,
गावँ की अल्हड एक छोरी।
जब से माँ के जीवन में,
ये नयी सहेली आयी है.

Based on true incident.

परमीत सिंह धुरंधर