14 फरवरी (#ValentinesDay)


नवम्बर का महीना था,
दिसंबर का इंतज़ार था,
वो बोलीं,
जनवरी में मेरी हो जायेंगीं।

एक चिठ्ठी पहुँची,
फरवरी में घर मेरे,
की 14 को,
वो किसी और की हो जायेंगीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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गर्भ से ही निकला हूँ करके तैयारी


जो प्रेम करता है पिता से,
वो होता है विलक्षण – प्रलयंककारी।
श्री राम, परशुराम, मेघनाथ, भीष्म, कर्ण,
अब है अभिमन्युँ की बारी।

बस पिता ही पूज्य हैं इस जीवन में,
बस वो ही विराजमान हैं ह्रदय में.
स्वीकार है, हर जख्म – हर घाव,
पुरस्कार है मौत भी इस पथ पे.

कितने भी हो आप भयंकर योद्धा,
महारथी और चकर्वर्ती,
क्या बांधेंगे मुझे इस चक्रव्यूह में?
गर्भ से ही निकला हूँ करके इसी दिन की तैयारी।
जो प्रेम करता है पिता से,
वो होता है विलक्षण – प्रलयंककारी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ औलादें पाल ही लेतीं है


माँ
औलादें पाल ही लेतीं हैं
चाहे परिस्तिथियाँ कैसे भी हो.
माँ चाहे बूढी हो
झुकी कमर हो
हड्डियों में बुढ़ापे का दर्द
और ठण्ड का असर हो
पर खिसक – खिसक कर
चूल्हे में आग डाल ही देती है.
माँ
औलादें पाल ही लेतीं है.

सुख से, दुःख से
हंस कर या रो कर
अपने – पराये सबसे लड़कर
माँ अकेले, जूझते हुए
वक्त के हर सितम को सहकर
अपने बच्चों को बड़ा कर ही देती है.
माँ
औलादें पाल ही लेतीं हैं.

जब सबकी आँखों में निंद्रा का यौवन हो
और नशों में आलस्य की मदिरा हो
सूरज भी जब ना निकल सके
उन गहन अंधेरो को चीरकर
थकान से टूटते जिस्म में
माँ स्फूर्ति भर ही लेती है.
माँ
औलादें पाल ही लेतीं हैं.

अपनी भूख दबाकर
अपनी अभिलाषाओं का दमन कर
मैली – कुचैली, फटी साड़ी में भी मुस्कराकर
चार दीवारों में बंध कर
सिमटी जिंदगी के बावजूद
हर पल उल्लास से भरकर
अपने बच्चों के लिए
रात – दिन, दोपहर
माँ रोटी सेंक ही देती है.
माँ
औलादें पाल ही लेतीं हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

Just keep kissing me


Nothing can stop me
If you just keep kissing me
Everybody knows that
Why I am here.

You know my feet
You know my moves
Nothing can change it
If you just keep kissing me.

I trust you
But not in the night baby
When so many booties are shaking.
Everybody knows that
What my desire is.
Nothing can change it
If you hold and just keep kissing me.

 

Parmit Singh Dhurandhar

एक कर्ज है बस तेरा ही बहना,


हम तोमर हैं,
हम राजपूत हैं.
हमारा गौरव है,
इतिहास भरा है,
हमारे साहस से.

हमारे पिता भी लड़ाकू थे,
रौंदा था दिल्ली को,
कई बार, बुढ़ापे में.
पर एक कर्ज है बस,
तेरा ही बहना,
इस चकर्वर्ती घराने पे.

हर बेटी,
ले गयीं दौलत ढ़ो – ढ़ो कर.
कभी दुःख बता कर,
तो कभी रो – रो कर.
बस तूने ही डाला था पर्दा,
हमारी खाली तिजोरी,
और टूटती दीवारों पे.

तू नारी नहीं, तू अबला नहीं।
ना किस्मत की कोई धारा है.
तू उस महारथी पिता की तेजोपुंज है,
जिसकी खडग थी तू,
उसके आखिरी समर में.

तू दीप नहीं जिसकी लौ,
हवाओं के दुआ पे.
तू चाँद नहीं जिसका अस्तित्व,
बस सूरज के छुपने पे.
तू उस महारथी पिता की पुत्री है,
दिशाएँ गूंजती थी जिसकी दहाड़ पे.
बस एक तेरा ही कर्ज है बहना,
उस चकर्वर्ती के इस घराने पे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

Give me the cloth


O baby, O baby,
Give me the cloth.
I want to fly,
High on the road.
Let the stars,
And the moon see,
How I am pretty and beautiful.
Just hold my waist,
And be with me,
I will drive you slowly.

O baby, O baby,
Give me the hold.
I want to fly,
High on the road.
I have no fear,
No shyness,
I am in love,
With this darkness.
O baby, O baby,
Give me the support.
I want to fly,
High on the road.

 

Parmit Singh Dhurandhar