Give me the cloth


O baby, O baby,
Give me the cloth.
I want to fly,
High on the road.
Let the stars,
And the moon see,
How I am pretty and beautiful.
Just hold my waist,
And be with me,
I will drive you slowly.

O baby, O baby,
Give me the hold.
I want to fly,
High on the road.
I have no fear,
No shyness,
I am in love,
With this darkness.
O baby, O baby,
Give me the support.
I want to fly,
High on the road.

 

Parmit Singh Dhurandhar

 

 

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You will be my tears


Lets start the journey,
Without thinking so much,
I will be your energy,
You will be my Nature.
And we can make something together.

Ups and downs are part of life,
In fact, they are like glue,
Which makes us unite,
And sticks together.
Lets start the journey,
Without thinking so much,
I will be your eyes,
And you will be my tears.
You will be my heart,
And I will be your creature.

You are such a lovely lady,
That I am falling for you.
Its not just your skin and color,
I love your hairs too.
Lets start the journey,
Without thinking so much,
You will be my spring,
And I will be your summer.
I will be your ocean,
And you will be my river.

You will make my days shorter,
And I will make the night longer.
You will be in my arms,
And our lips will be closer.
Lets start the journey,
Without thinking so much,
I will be your world,
And you will be my leader.
I will be your gardener,
You will be my flower.

Lets start the journey,
Without thinking so much,
You will be my sky,
And I will be your star.
I will be your sun rays,
You will be my shower.

 

Parmit Singh Dhurandhar

माँ


माँ एक शब्द नहीं,
संसार है.
माँ सिर्फ धन नहीं,
कल्पवृक्ष, धेनुगाय है.
माँ सागर सी गहरी नहीं,
बल्कि अनंत हैं.
माँ ब्रह्मा, विष्णु, महेश नहीं,
गंगा, सरस्वती भी है.
माँ सिर्फ साकार एक तन नहीं,
निराकार सम्पूर्ण ब्रह्म है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरी माँ से मधुर, जग में कुछ भी नहीं


mom

मेरी माँ से मधुर, जग में कुछ भी नहीं।
मेरे पिता से चतुर, जग में कोई नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा प्रबल,
विकट – विरल, इस धरा पे कोई नहीं।

मेरी माँ से निर्मल, कोई गंगा नहीं,
मेरे पिता से प्रखर कोई सूर्य नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा अहंकारी,
अभिमानी, उन्मादी, उस सृस्टि में कोई नहीं।

मेरी माँ से सुन्दर, इस ब्रह्माण्ड में कोई नहीं।
मेरे पिता से तेजस्वी, इस त्रिलोक में कोई नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा धुरंधर,
भयंकर, और विशाल समुन्दर, कोई नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

खटमल बन गइल बा इ खाट रजऊ


रखलीं हमारा के रतिया में पास रजऊ,
की खटमल बन गइल बा इ खाट रजऊ.
चूसअता खून हमार अंग – अंग से,
पोरे – पोरे देता इ दाग रजऊ.
पूरा होत नइखे निंदिया कहियों हमार,
टूट जाता रोजे कच्चे ख्वाब रजऊ.
रखलीं हमारा के रतिया में पास रजऊ,
की खटमल बन गइल बा इ खाट रजऊ.
अइसे मत काटअ जवानी विरह में,
मिलल बा इ जीवन बड़ा ख़ास रजऊ.
कब तक रहेम सन बन के चाचा – चाची,
पलना में दे दीं एकठो लाल रजऊ.
ना त बुढ़ापा में हो जाएम टुअर – टॉपर,
छोड़ दीं इ सत्ता और ताज रजऊ.
रखलीं हमारा के रतिया में पास रजऊ,
की खटमल बन गइल बा इ खाट रजऊ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कमर पे चोटी लटके, वीणा में तार जैसे to वेणी उसके नितम्बों पे, सम्मोहन का मोहनी बाण लिए : A tribute to my father


It is a rare combination that a father – son pair has same passion or interest until it comes to politics, business and film industry.
When I was in high school, one day, I told my father, “I don’t have any quality whereas my friends are so much talented, smart and handsome. I feel bad.” My father in his characteristic smile narrated two of his poems and taught me how to write poems. It was first time he explained me the meaning of love and beauty by just telling his two lines (“वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान.”) of his poem that he wrote during his school life. He had not remembered the whole poem nor he had saved any of his poems by writing. By his second poem, he taught me to write on girl. The lines from his second poem are:
मुख मोड़ कर खड़ी है, समझाऊं कैसे?
दिल तोड़ कर खड़ी हैं, मनाऊं कैसे?
कमर पे चोटी लटके, वीणा में तार जैसे।
बीच में लक्ष्मण रेखा पड़ी है, पास जाऊं कैसे।
(https://hotcrassa.wordpress.com/2017/09/17/%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%a3%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a5%87/)
Later, to pay my tribute to him, I used his lines “ वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान” and made a full poem.
वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।
तेरे ही योवन पे, जी रहा है किसान।
जब- जब तेरे ह्रदय पे, किया है मैंने प्रहार,
तूने अपनी ममता से, भर दिया है मेरा खलिहान।
वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।
तेरी ही अंगराई से, है मेरे मूछों का अभिमान।
जब-जब आया हूँ दर पे तेरे, मैं भूखा, खाली हाँथ,
तूने लूटा कर खुद को, भर दिया है मेरा आँगन और बथान।
वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।
तेरे ही आँचल में, मुस्काता है परमीत इंसान।
(https://hotcrassa.wordpress.com/2014/04/11/%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a4%ae-%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a8/)
However, I always wanted to write something on girl by keeping his style and view and just by changing words. I used his lines “कमर पे चोटी लटके, वीणा में तार जैसे।” and wrote “वेणी उसके नितम्बों पे, सम्मोहन का मोहनी बाण लिए ” in my recently written poem which has following lines:
समीकरण बदल रहें है भूमण्डल के, पुष्पित – पुलकित उसके यौवन से.
दो नयन, इतने उसके निपुण, कण – कण में रण के,
क्षण – क्षण में, हर इक पल में. पूरब – पश्चिम, उत्तर – दक्षिण में,
तैर रहे हैं तीर, उसके तरकश के.
कट रहे, मिट रहे, कोई अर्जुन नहीं, अब कोई कर्ण नहीं।
सब जयदर्थ सा छिप रहे, भय लिए मन में.
अधरों पे मुस्कान लिए, वक्षों पे गुमान लिए.
वेणी उसके नितम्बों पे, सम्मोहन का मोहनी बाण लिए.
आतुर हो, व्याकुल हो, सब चरण में उसके,
सब शरण में उसके, गिड़ रहे, पड़ रहे.
आखों की आतुरता, मन की व्याकुलता,
देख पौरष की ऐसी विवशता।
देव – दानव – मानव, पशु – पक्षी,
स्वयं ब्रह्मलोक में ब्रह्मा भी,
रच रहे हैं श्लोक उसके रूप के गुणगान में.
(https://hotcrassa.wordpress.com/2017/09/13/%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%a3%e0%a5%80-%e0%a4%89%e0%a4%b8%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d/)
This is my tribute to him as a father, as a friend and as a teacher, who taught me writing. At that time, I did not understand why he wanted me to develop skills in writing. However, now, I see this as a boon or best gift from him to live life during difficult phase.

 

Parmit Singh Dhurandhar