वो ही कृष्णा है


जो मधु से मधुकर,
जो सूक्ष्म से सूक्ष्मतर,
जो भय से भी भयंकर,
वो ही कृष्णा है.

जो प्रबल में प्रबलतम,
जो न्यून में न्यूनतम,
जो श्रेष्ठ में श्रेष्ठतम,
वो ही कृष्णा है.

जो सागर में समुन्दर,
जो चिर में निरंतर,
जो अमृत के सामानांतर,
वो ही कृष्णा है.

जो कण – कण में सम्माहित,
काल में प्रवाहित,
काम-तप-रज में संचालित,
वो ही कृष्णा है.

जो भूखंड के खंड में,
पुष्प के मकरंद में,
जो आनंद – विरह के क्षण में,
वो ही कृष्णा है.

जो नारी के सौंदर्य में,
शिशु के बालपन में,
और प्रेयसी के आलिंगन में,
वो ही कृष्णा है.

जो रण में,
शयन में,
मन के हर चुभन में,
वो ही कृष्णा है.

जो शिव के तांडव में,
इंद्रा के विलास में,
सरस्वती के ज्ञान में,
वो ही कृष्णा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

Advertisements

वो कृष्णा हैं


जो रिश्ते में बंध के भी ना बंधे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो प्रेम में बंध के भी ना बंधे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो रणभूमि में स्थिर हो कर भी युद्ध करे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो भीष्म के संगती में भी,
विदुर का साग खाये,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो त्रिलोकी हो के भी,
सुदामा को ताज दे दे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो भक्तों का क्रोध – ताप,
हंस के सह ले,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो राधा के मन में हो,
और रुक्मिणी संग चरे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो अलौकिक – अद्भुत होके भी,
कण – कण में विराजे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो सबको मोहित कर,
स्वयं निर्मोही रहे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो सबको साध्य कर,
स्वयं असाध्य रहे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो काल को संचालित कर,
स्वयं कालचक्र से ग्रसित हो,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो पांडवों संग रह कर भी,
कौरवों के संग प्रतिपल में विराज करे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो अपने – पराये का भेद छोड़ कर,
सुदर्शन को संचालित करे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


भगवान गणेश जी, भगवान श्री कृष्णा जी और भगवान हनुमान जी, सभी महान बने क्यों की उनका बचपन बस माँ और उनके हाथों से बने खाने को खाने में गुजरा। माँ के हाथ और उसके हाथ से बने खाने की महिमा इसी से समझी जा सकती है.

 

परमीत सिंह धुरंधर