मैं भी त्याग करूँ सर्वश्व अपना


आवो माँ,
करें उपासना शिव – शंकर की,
हम आज साथ में.
पिता मेरे कितने भोले हैं?
रखते हैं सर्पों को भी साथ में.
सर्वश्व त्याग कर जिसने,
सिर्फ एक कैलास को थाम लिया।
अमृत दे कर जग को सारा,
जिसने स्वयं विष-पान किया।
तो आवो माँ,
चरण पखारें शिव – शंकर की,
आज हम साथ में.
पिता मेरे कितने भोले हैं?
रखते हैं सर्पों को भी साथ में.
हर जन्म में पुत्र बनूँ मैं शिव का,
ये गोद मिला मुझे सौभाग्य से.
बन कर धुरंधर शिव सा,
मैं भी त्याग करूँ सर्वश्व अपना,
जग कल्याण में.
तो आवो माँ,
आशीष ले शिव-शंकर की,
हम आज साथ में.
पिता मेरे कितने भोले हैं?
रखते हैं सर्पों को भी साथ में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

गजानन स्वामी मेरे


गजानन – गजानन, प्रभु मेरे,
मुझ पर भी दया दृष्टि करो.
मुश्किलों में है सारी राहें मेरी,
हे विध्नहर्ता, इन्हे निष्कंटक करो.
ज्ञान के आप हो अथाह – सागर,
दिव्य ललाट और विशाल – नयन.
अपने नेत्र-ज्योति से मेरे जीवन में प्रकाश करो.
गजानन – गजानन, स्वामी मेरे,
मेरे मन-मस्तिक में विश्राम करो.
अपमानित हूँ, दलित हूँ,
जग के अट्ठहास से जड़ित हूँ.
आप प्रथम -पूज्य, आप सुभकर्ता,
महादेव – पार्वती के लाडले नंदन।
मेरे मस्तक पे अपना हाथ रखों।
गजानन – गजानन, स्वामी मेरे,
इस अपने सेवक का भी मान रखो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कोई नहीं गणपति जैसा: सुन्दर और वयापमं.


कोई नहीं गणपति जैसा!
सुन्दर और वयापमं।
कोई नहीं गणपति जैसा!
सरल और सुगम।
हर्षित कर दें मन को,
और पुलकित हर उपवन।
कोई नहीं गणपति जैसा!
विघ्न – विध्वंशक।
कोई नहीं गणपति जैसा!
उत्तम -सर्वोत्तम।
विकट-विरल हो परिस्थिति,
या दुर्गम -दुर्लभ मार्ग हो.
कोई नहीं गणपति जैसा!
जो कर दे, हर मार्ग, निष्कंटक।
कोई नहीं गणपति जैसा!
जो देवों में प्रथम।
बस मोदक पे ही,
तुम्हे आशीष अपना दे दें.
बस दूर्वा पाकर तुमसे,
कर दे तुम्हारा भाग्योदम।
कोई नहीं गणपति जैसा!
मधुर- और – मोहक।

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


भगवान गणेश जी, भगवान श्री कृष्णा जी और भगवान हनुमान जी, सभी महान बने क्यों की उनका बचपन बस माँ और उनके हाथों से बने खाने को खाने में गुजरा। माँ के हाथ और उसके हाथ से बने खाने की महिमा इसी से समझी जा सकती है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जय गणपति-जय मंगलमूर्ति


पापों से मुक्ति,
ज्ञान और भक्ति,
सब मुझको दीजिये,
हे गणपति.
मैं हूँ आपका सेवक,
आप मेरे स्वामी,
हे अधिपति।
मेरे मस्तक में,
प्रवाह करो,
ह्रदय में मेरे,
वास करो.
आँखों में ज्योति,
हो तुम्हारी,
साँसों में संस्कार,
भरो,
हे मंगलमूर्ति।

 

परमीत सिंह धुरंधर