मुझे हिमालय चाहिए


मेरी निराशा के बीज,
के अंकुरण से बनी शाखाएं,
अपने काँटों से, मेरे जिस्म को,
नोचती हैं, कचोटती हैं,
और लहूलुहान करके,
खुद को पोषित करती हैं.

मेरी आशाओं के पुष्प,
जो मेरे कमरों, आँगन में,
महफूज हैं,
उनकी सुख रही और मुरझा चुकी,
पंखुड़ियां, मेरी भावनाओं को,
को कुचल – कुचल कर,
अपनी अधूरेपन का दंश मिटा रही हैं.

और मैं,
अपने जीवन के पथ पे,
इनका बोझ उठाये,
इनको सहेजे,
इनके दिए जख्म, दंश,
से प्रताड़ित हो कर भी,
इनको साथ लिए,
बढ़ रहा हूँ.

मैं बढ़ रहा हूँ,
इसलिए नहीं की,
मुझे किसी मंजिल की अब उम्मीद है.
इसलिए भी नहीं की,
कोई, कहीं, ये भाड़ मुझसे ले ले.
इसलिए भी नहीं की मैं तेज क़दमों से,
इनको पीछे छोड़ दूँ.
इसलिए भी नहीं की,
मैं इनका बोझ नहीं उठा सकता।
इसलिए भी नहीं की मैं कहीं,
ये बोझ लेकर नहीं बैठ सकता।

बल्कि इसलिए की,
मैं अपनी बेचैनी,
से भागना चाहता हूँ.
मैं अपने बेचैन मन को,
शांत करना चाहता हूँ,
इसको बांधना चाहता हूँ,
इसको साधना चाहता हूँ.
मैं नहीं जानता कैसे करूँ?
मैंने कभी इसको साधने,
बाँधने की कोसिस नहीं की.
ना सीखा, ना सिखने की कोसिस की.

मैं भाग रहा हूँ अपने सारे बोझ के साथ,
की कही मेरे मन को भटका दूँ,
कहीं इसको उलझा दूँ.
मगर मन तो ऐसे मृगचिका की तलाश में है,
की ना इसको कुछ मिल रहा,
ना ये मुझे छोड़ रहा.
मेरे मन ने मेरे जीवन को रेगिस्तान बना दिया है.

आज पूरा रेगिस्तान नाप कर,
मैं समझा की, नशों को कसरत से नहीं,
दिव्य – पदार्थों से नहीं,
साधना से साधा जाता है.
आज मैं भाग रहा हूँ,
हिमालय तक पहुंचने को.
शायद उस वीरान, भीषण ठण्ड में,
मन का ताप थोड़ा तो कम हो.
शायद, उस शीत-प्रदेश में,
मन को जल न सही, कुछ ओस की बुँदे ही मिले।

जी हाँ, सदा सुनते आया की,
पुरखे अपने जीवन की चौथी भाग में,
हिमालय जाते थे, मुक्ति को,
मोक्ष को.
मैं तो अपने जीवन के दूसरे पहर में ही,
उस हिमालय के तलाश में हूँ.
उस हिमालय की शरण का अभिलाषी हूँ.
मैं अपने हर बोझ को साथ ले कर,
उस चिरंजीवी, अविचलित, स्थिर,
भव-संटक की तलाश में हूँ.

इसलिए चल रहा हूँ.
इसलिए रुकता नहीं।
इसलिए जीवन में अब कोई आकांक्षा नहीं।
मुझे हिमालय चाहिए।
मुझे हिमालय की आगोश चाहिए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं इतना टूटा हुआ हूँ


मैं इतना टूटा हुआ हूँ,
बिखरा हूँ हवाओं में.
वक्त के थपेड़ों में,
मेरा कोई खंडहर भी नहीं बचा है.
लहरों को क्या दोष दूँ?
कच्चे थे जब मेरे ही पाँव।
खूबसूरत दलदलों की ऐसी चाहत थी,
की अब कोई किनारा भी नहीं बचा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे जीवन का मूल -मंत्र


चिनाय सेठ, मैं शीशे के घर में इसलिए रहता हूँ की कोई पत्थर तो मारे, और फिर मैं उसके ऊपर पथरों की बरसात कर दूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

 

मेरा खाट अभी तक कुंवारा है


तू माँ बन गयी चार बच्चों की,
मेरा खाट अभी तक कुंवारा है.
तेरे हुस्न का चर्चा गली-गली में,
मेरे कुंवारेपन का ढिंढोरा है.
जगमग करते महल में,
तू सोती है दिया भुझा के,
मेरे जीवन में बस अँधियारा है.
चालीस में भी बलखाती है तू,
जाने किसको रिझाने को,
मेरे बुढ़ापे का अब तक ना कोई सहारा है.
तू माँ बन गयी चार बच्चों की,
मेरा खाट अभी तक कुंवारा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तू माँ बन गयी चार बच्चों की


मैं आशिक़ हूँ तेरी नजरों का,
रहता हूँ मयखाने में,
तू माँ बन गयी चार बच्चों की,
मैं बैठा हूँ बंजारों में.
जाने क्या मिल गया तुझे?
चंद लकीरें मिटा कर.
सोना – चाँदी से तन तेरा शोभे,
हम जुगनू बन रह गए अंधेरों में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

खाने को कुछ स्वादिष्ट नहीं


मेरी मंजिलें,
हैं मुझे ही खफा.
जाने जिंदगी,
ये कैसा इम्तिहाँ?
अकेला, तन्हा,
चाहे दिन हो, या रात.
मुश्किलों में हैं,
हर एक साँस।
मेरी ख्वाइशें,
सब मुझसे ही खफा.
जाने जिंदगी,
ये कैसा इम्तिहाँ?
मिलने को कोई,
माशूक नहीं।
खाने को,
कुछ स्वादिष्ट नहीं।
मेरी हसरतें हैं,
मुझसे ही खफा.
जाने जिंदगी,
ये कैसा इम्तिहाँ?

 

परमीत सिंह धुरंधर

क्षत्राणी का दूध और भगवान् शिव का आशीर्वाद प्राप्त है मुझे


बस गगन के वास्ते हो राहें मेरी,
फिर चाहे आमवस्या में हो या राहें पूर्णिमा में।
उम्र भर चाहे ठोकरों में रहूँ, कोई गम नहीं,
मगर मंजिलें मेरी राहों की हो आसमाँ में।
तारें चाहें तो छुप लें,
चाँद चाहे तो अपनी रौशनी समेट ले.
हो प्रथम स्वागत चाहे अन्धकार में मेरा,
मगर प्रथम चुम्बन उषा का हो आसमाँ में.
पाला -पोसा गया हूँ छत्रसाया में धुरंधरों के,
तो क्यों ना अभिमान हो मुझे?
लहू तो सभी का लाल है यहाँ,
मगर एक इतिहास खड़ा है मेरे पीछे।
यूँ ही नहीं तेज व्याप्त है मेरे ललाट और भाल पे,
क्षत्राणी का दूध और भगवान् शिव का
आशीर्वाद प्राप्त है मुझे।
मेरा अपमान क्या और सम्मान क्या भीड़ में?
जब तक मेरे तीरों का लक्ष्यभेदन हैं आसमाँ में.
अंक और केसुओं की चाहत में रेंगते हैं कीड़े भी,
फिर मैं क्या और और अफ़सोस क्यों ?
जब तक लहराता है मेरा विजय-पताका आसमाँ में.

 

परमीत सिंह धुरंधर