क्षत्राणी का दूध और भगवान् शिव का आशीर्वाद प्राप्त है मुझे


बस गगन के वास्ते हो राहें मेरी,
फिर चाहे आमवस्या में हो या राहें पूर्णिमा में।
उम्र भर चाहे ठोकरों में रहूँ, कोई गम नहीं,
मगर मंजिलें मेरी राहों की हो आसमाँ में।
तारें चाहें तो छुप लें,
चाँद चाहे तो अपनी रौशनी समेट ले.
हो प्रथम स्वागत चाहे अन्धकार में मेरा,
मगर प्रथम चुम्बन उषा का हो आसमाँ में.
पाला -पोसा गया हूँ छत्रसाया में धुरंधरों के,
तो क्यों ना अभिमान हो मुझे?
लहू तो सभी का लाल है यहाँ,
मगर एक इतिहास खड़ा है मेरे पीछे।
यूँ ही नहीं तेज व्याप्त है मेरे ललाट और भाल पे,
क्षत्राणी का दूध और भगवान् शिव का
आशीर्वाद प्राप्त है मुझे।
मेरा अपमान क्या और सम्मान क्या भीड़ में?
जब तक मेरे तीरों का लक्ष्यभेदन हैं आसमाँ में.
अंक और केसुओं की चाहत में रेंगते हैं कीड़े भी,
फिर मैं क्या और और अफ़सोस क्यों ?
जब तक लहराता है मेरा विजय-पताका आसमाँ में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तुमसे बच्चे कर लुंगी


तुम्हे अपनी नजरों से इसारे कर दूंगी,
ना माने अगर बाबुल तो भी तुमसे बच्चे कर लुंगी।
दुनिया चाहे जो भी नाम दे दे मुझे,
पति को दे के जहर, तुम्हारी ता – उम्र गुलामी कर लुंगी।
एक सनक सी सवार है मस्तक पे मेरे,
तुझे पाने के लिए, हर गुनाह कर दूंगी।
रहती हूँ भोली – भाली सी घर – शहर में,
मगर तुझे अपना बनाने को, कमीनी बन लुंगी।

कुछ लोग सनकी होते हैं. उनके मस्तक पे एक सनक सवार होती है. तूफ़ान भी आ जाए, और अगर वो निकल चुके हैं घर से तो , वापस नहीं लौटेंगे। वो मिट जाएंगे, दुनिया हँसेगी, लेकिन उनको अपनी सनक, अपनी मौत से ज्यादा प्यारी है. ऐसे लोगो की हार नहीं होती, भले दुनिया उन्हें हारा हुआ समझे। ये लोग भले ज्यादा दिन न रहे, राज न करे, पर जब तक होतें हैं, एक बंटवारा तो हुआ रहता है समाज का उनके नाम पे, उनके काम पे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अमीर खुद -ब-खुद बन जाएंगे


मिल कर कुछ दूर तो संग चले,
हौसले खुद-ब-खुद बढ़ जाएंगे।
एक पत्थर तो तोड़े संग बैठ के दोस्तों,
रास्ते खुद-ब-खुद सरल-सुगम हो जाएंगे।
मंजिलों की चाहत नहीं,
इस कदर तन्हा कटी है जिंदगी।
बस एक कारवाँ मिल जाए,
मंजीले हम खुद बना लेंगें।

सितारें जमीं पे लाने की कोसिस करने वालो,
कभी दिलों के दर्द को मिटा के तो देखो।
इस गुलशन की खुश्बूं आसमान तक जायेगी,
कभी फूलों को भौरों से मिला के तो देखो।
हाथ थाम कर कुछ देर तो संग बैठें,
हर जख्म खुद-ब-खुद मिट जाएंगे।
कुछ और नहीं तो,
किस्से -कहानियां ही बाँट ले संग में,
अमीर तो हम खुद -ब-खुद बन जाएंगे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

बम-बम भोले


बम-बम भोले, बम-बम भोले,
ये कैसा है खेल जिंदगी का.
तन्हा हैं हम, अकेले हैं हम,
कोई नहीं है इस जीवन का.

तुम तो कैलास पे विराज गए स्वामी,
मुझे यूँ धरती पे अकेला छोड़ के.
तुम तो आँखें मुद ध्यान में लीं हो गए,
मुझे दर्द में, पीड़ा में छोड़ के.
बम-बम भोले, बम-बम भोले,
ये कैसा है खेल जिंदगी का.
तन्हा हैं हम, अकेले हैं हम,
कोई नहीं है इस जीवन का.

मुझे माटी से इतना प्रेम दे के,
मुझे माटी से दूर कर गए.
मेरी आँखों में इतना ख्वाब दे कर,
फिर क्यों इसमें इतना आंसूं भर गए?
मैं रोता हूँ, मैं चिल्लाता हूँ,
अब क्या करूँ इस जीवन का?
बम-बम भोले, बम-बम भोले,
ये कैसा है खेल जिंदगी का.
तन्हा हैं हम, अकेले हैं हम,
कोई नहीं है इस जीवन का.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जीवन क्या है?


जीवन क्या है?
नदी है, तालाब है,
धारा है, किनारा है.
कुछ नहीं।
जीवन है निरंतर बहते रहना,
चाहे अपने किनारे ही डूब जाएं,
सागर से मिलने से पहले,
अपनी सारी लहरे सुख जाएँ।

जीवन क्या है?
सत्ता है, समाज है,
सुख है, विलास है.
कुछ नहीं।
जीवन है निरन्तर त्याग करते रहना,
हर दुःख के बावजूद, दूसरों के दुःख,
को मिटाने का प्रयास करते रहना।

जीवन क्या है?
सूरज है, चाँद है,
आसमान है, या तारे हैं.
कुछ नहीं।
जीवन है निरंतर अन्धकार को मिटाने का,
और प्रकाश को फैलाने का प्रयास करना।
जब तक सबके आँगन में रौशनी न पड़े,
जलते रहना, जल कर दूसरों का अन्धकार हरना।

जीवन क्या है?
ज्ञान है, विज्ञान है,
संम्मान है, संस्कार है.
कुछ नहीं।
जीवन है निरंतर सहयोग करना,
पशु बन कर, गुरु बनकर,
सहयोगी बनकर।

जीवन क्या है?
उल्लास है, उत्साह है,
उत्तजेना है, उपकार है.
कुछ नहीं।
जीवन है निरंतर प्रयास करना,
खोज करना की हम किसी के काम आ सके.

जीवन क्या है?
वेद है, उपनिषद है,
गीता है, धर्म है.
कुछ नहीं।
जीवन हैं निरंतर प्रेम करना,
पशुओं के जीवन को भी जीवन समझना।
उनके आँसुंओं के पीछे के दर्द को समझना।

जीवन क्या है?
उत्थान है, उद्भव है,
उन्नति है, उद्देश्य है.
कुछ नहीं।
जीवन है सिर्फ नारी ही नहीं,
हर मादा का संम्मान करना।
उनके परिवार, उनके मातृत्व को समझाना।

जीवन क्या है?
होली है, दीवाली है,
ईद है, लोहरी है.
कुछ नहीं।
जीवन है हर बुराई को मिटाना,
सभयता के नाम पे, धर्म के नाम पे,
ना सताना, ना बांधना और ना रुलाना।
सती-प्रथा, बाल-विवाह की तरह,
जालिकुट्टी और आमानवीय सभ्यताओं का विरोध करना,
त्याग करना, प्रतिकार करना, बहिष्कार करना।

 

परमीत सिंह धुरंधर