हम फिर भी लड़ेंगे काश्मीर के लिए


ये धर्म रहे,
या फिर ये धर्म न रहे.
कोई योगा करे,
या फिर योगा ना करे.
हम फिर भी लड़ेंगे काश्मीर के लिए,
क्यों की ये बना है,
सिर्फ मेरे हिन्दुस्तान के लिए.
कोई राम की पूजा करे,
या फिर पूजा न करे.
कोई गंगा में नहाये,
या फिर ना नहाये.
हम फिर भी सर कटाएंगे काश्मीर के लिए,
क्यों की ये बना है,
सिर्फ मेरे हिन्दुस्तान के लिए.
यहाँ हिन्दू रहें,
या फिर मुस्लिम रहें.
चाहे इस धरती पे,
सिक्ख-बौद्ध ही खेलें.
हम फिर भी लुटाएंगे,
सब कुछ अपना काश्मीर के लिए,
क्यों की ये बना है,
सिर्फ मेरे हिन्दुस्तान के लिए.
हम आपस में चाहे लड़ें,
या फिर न लड़ें.
हममें प्रेम हो,
या फिर ना हो.
हम फिर भी एक हो कर,
खून बहायेंगे अपना काश्मीर के लिए,
क्यों की ये बना है,
सिर्फ मेरे हिन्दुस्तान के लिए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

लड़की काश्मीर की


तुम लड़की काश्मीर की,
मैं लड़का बिहार का.
आ जा खेल ले थोड़ा-थोड़ा,
ये खेल प्रेम का.
तुम लड़की काश्मीर की,
मैं लड़का बिहार का.
आ जा घर बसा लें,
हम दिल्ली में यहाँ।
तुम धीरे-धीरे चलना,
हर सुबह मुस्करा के.
मैं तुमको चाय पिलाऊं,
तुम मुझको खाना खिलाना.
तुम लड़की काश्मीर की,
मैं लड़का बिहार का.
आ जा खेल ले थोड़ा-थोड़ा,
ये खेल प्रेम का.
तुम सर्दी कहो तो,
मैं सर्दी कह दूंगा।
भरी दुपहरिया में,
कम्बल ओढ़ के हाँ.
तुम लड़की काश्मीर की,
मैं लड़का बिहार का.
आ जा घर बसा लें,
हम दिल्ली में यहाँ.
रोज तुम्हारी नखरों पे,
सुबहा-शाम हो.
रोज हमारी फरमाइशों,
से सजी रात हो.
तुम लड़की काश्मीर की,
मैं लड़का बिहार का.
आ जा खेल ले थोड़ा-थोड़ा,
ये खेल प्रेम का.
हर रोज एक नई,
नथुनी मैं तुमको दूंगा.
तुम सज-संवर के,
मुझसे मिलती रहना।
तुम लड़की काश्मीर की,
मैं लड़का बिहार का.
आ जा घर बसा लें,
हम दिल्ली में यहाँ.

परमीत सिंह धुरंधर