निगाहें


निगाहें ही काफी हैं,
यह दर्द जगाने के लिए.
आदाओं को रखों,
घूँघट उठाने के बाद,
बिजली गिराने के लिए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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You are Jwala Gutta


 

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I am Parmit Crassa,
You are Jwala Gutta.
मिल जाएँ हम तो,
लूट लें ये सारी दुनिया।
I am Parmit Crassa,
You are Jwala Gutta.
नजर में कुछ भी नहीं,
बस जिगर में तुम हो.
तुम मान जाओ तो,
बसा ले अपनी छोटी सी दुनिया।
I am Parmit Crassa,
You are Jwala Gutta.

Figure was from google image.

परमीत सिंह धुरंधर

Jwala Gutta


हम हैं Parmit Crassa,
तुम हो Jwala Gutta.
आवों बसा लें अपनी,
एक छोटी सी दुनिया।
जिसमे एक चूल्हा हो,
जिसको तुम जलाती हो.
जिसमे एक मुन्ना हो,
जिसको हम खेलाते हों.
हम हैं Parmit Crassa,
तुम हो Jwala Gutta.
आवों सजा ले अपनी,
ये छोटी सी बगिया।
जब तुमको चोट लगे,
मैं हल्दी छाप दूँ.
जब मुझको भूख लगे,
तुम मछली बना लेना।
हम हैं Parmit Crassa,
तुम हो Jwala Gutta.
आवों बना ले अपनी
छोटी सी कुटिया।
मैं कंगन खरीद लाऊं,
तुम दिन – भर ख़नक़ाना।
मैं साड़ी पहनाऊं,
तुम मुझको नहलाना।
हम हैं Parmit Crassa,
तुम हो Jwala Gutta.
आवों एक कर लें,
अब अपनी खटिया।

For Jwala Gutta

 

परमीत सिंह धुरंधर

तो क्या हुआ?


ये नजर,
ये हुस्न,
ये रंग तेरा,
मेरे नसीब में नहीं तो क्या हुआ?
मेरी उम्मीदों को,
सवारती तो हैं.
तेरे होंठ,
तेरी जुल्फें,
तेरा आगोश,
मेरा नहीं तो क्या हुआ?
मुझे ख्वाब दिखाती तो हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तुम्हारी आँखे


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मेरे इरादे बदल देतीं हैं तुम्हारी आँखे,
मेरे सपने सजा देतीं हैं तुम्हारी आँखे।
दूरियां जो हैं हमारे दरमियाँ,
उसे कितना छोटा बन देतीं हैं तुम्हारी आँखे।
सम्पूर्ण से लगते इस जीवन को,
तुरंत, एक पल में, अधूरेपन का एहसास,
दिला देतीं हैं तुम्हारी आँखे।
कितना भी मयखाने से पी लूँ, उठाकर,
सीने में प्यास जगा ही देतीं हैं तुम्हारी आँखे।
तुम ज्वाला बनके धधकती रहो,
जलाती रहो, मिटाती रहो.
बस यूँ ही कभी-कभी,
हमसे लड़ा लो तुम्हारी आँखे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

Its your eyes, which is keeping me alive. Its your eyes which makes me to try for my dream. Its your eyes which makes me to feel your breath, your closeness. All my feelings, my desire and my energy is due to your eyes. Its only your eyes …only your eyes….that is my life……

Crassa और Jwala


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Crassa और Jwala की जोड़ी कैसी,
बिना आँखों में कोई शर्म के,
बस मस्ती ही मस्ती।
तो धधकने दो, ज्वाला को यूँ ही.
पसीना बहा देंगे मंजिल के लिए,
खून का कतरा, आँखों में छलक आये.
तो भटकने दो, Crassa को यूँ ही,
बस्ती ही बस्ती।

 

परमीत सिंह धुरंधर

The image was taken from Google search.

 

तो फिर से वो मंजिल नजर आई


बड़े दिनों बाद याद तुम्हे मेरी आई,
चलो कुछ नहीं,
आखिर तुम परदे से बाहर तो आई.
हम भी मसरूफ थे,
जाने किस मंजिल को पाने के लिए?
तुम दिखे,
तो फिर से वो मंजिल नजर आई.

 

परमीत सिंह धुरंधर

When I saw your face, I realized my mistake that I had chosen wrong path. My goal is you and I don’t know how I forgot that.