कमल को पुलकित कर देंगे


हम हर तस्वीर को बदल देंगें,
सबकी तकदीर को बदल देंगे।
हम योगी ही नहीं, वैरागी भीं है,
कण-कण में कमल को पुलकित कर देंगे।
वो जो कहतें हैं की मेरी छवि दागदार है,
उनके गिरेवान में देखिये, कितने आस्तीन के साँप हैं.
हम दिन के ही नहीं, बल्कि उनके रातों के गुनाह को भी,
सरे आम, उजागर कर देंगे।
हम योगी ही नहीं, वैरागी भीं है,
जन्नत – से -जहन्नुम तक की सब राहें समतल कर देंगे।
हम योगी ही नहीं, वैरागी भीं है,
कण-कण में कमल को पुलकित कर देंगे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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शहादतों को सरहदों में मत बांटों


शहादतों को सरहदों में मत बांटों,
भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद,
भारत की आज़ादी के लिए लड़े थे,
ना की हिन्दू कौम के लिए.
सुभाषचंद्र बोस की लड़ाई ब्रिटिशों से थी,
ना की मुस्लिमों से.
फिरकापरस्त है वो लोग जो, धर्म और क्षेत्र में,
बाँट रहे हैं देशभक्तो को.
अस्फाकुल्लाह खान हों या टीपू सुलतान,
सब भारत की शान हैं.
उनकी शहादत भारत के लिए थी,
ना की मजहब और अपने कौम के लिए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

सरदार और गाँधी


सरदारों की जमीन पे कुछ गलत होता नहीं,
ये नहीं होते, तो गांधी भी यहाँ पूजे जाते नहीं।
हाल वही होता जो हो रहा है तिब्बत का,
बिना इनके बलिदानो के हम आज़ाद होते नहीं।
वो हैं की,
हमारी आज़ादी को अपनी भेंट और हक़ बताते हैं.
ये हैं की अपना सबकुछ लुटा कर भी,
आज तक कुछ भी जताते नहीं, मुह खोला नहीं।
बंटवारा जिन्होंने स्वीकार किया सरहदों का,
अगर वो इतने धर्मनिरपेक्ष थे,
तो इनका ख़याल आया क्यों नहीं?
सरदारों की जमीन पे कुछ गलत होता नहीं,
ये नहीं होते, तो गांधी भी यहाँ पूजे जाते नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

स्त्री


सत्य की पूजा नहीं होती,
धर्म की चर्चा नहीं होती।
वेदों को जरूरत नहीं,
जिन्दा रहने के लिए,
की मनुष्य उसे पढ़ें।
वेदों की उत्पत्ति,
मनुष्यों से नहीं होती।
तैमूर, चंगेज, क्या?
सिकंदर भी थक गया था,
यहाँ आके.
ये हिन्द है,
यहाँ तलवारो के बल पे,
तकदीरें सुशोभित नहीं होती।
वो जितना भी सज ले,
तन पे आभूषण लाद के.
मगर, यहाँ, बिना शिशु को,
स्तनपान कराये,
नारी कभी पूजित नहीं होती।
घमंड किसे नहीं,
यहाँ सृष्टि में.
बिना अहंकार के,
सृष्टि भी शाषित नहीं होती।
तीक्ष्ण बहुत है तीर मेरे,
मगर बिना तीक्ष्ण तीरों के,
शत्रु कभी पराजित नहीं होती।
मुझे संतोष है,
की वो वेवफा निकली।
क्यों की बिना बेवाफ़ाई के,
कोई स्त्री कभी परिभाषित नहीं होती।

 

परमीत सिंह धुरंधर

हमें JNU नहीं, नालंदा चाहिए


हमें JNU नहीं,
नालंदा चाहिए।
तुम मांगते हो,
फ्रीडम ऑफ़ स्पीच,
हमें लोहिया चाहिए।
तुम चाहते हो दीवारें,
की साजिशें रचो.
हमें खुले आसमा के,
तले छत चाहिए।
तुम्हारे इरादें की हर फूल का,
अलग बगीचा हो.
हमें तो अनेक फूलों की,
एक ही माला चाहिए।
की अब वक्त आ गया है,
हमें चाणक्य चाहिए।
की हमें अफजल नहीं,
बस अशफाक चाहिए,
हर Crassa को अब यहाँ,
एक आफताब चाहिए।
अपनी आखिरी साँसों तक,
हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख-ईसाई,
सबको पूरा और एक हिन्दुस्तान चाहिए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

कलम भी मौन रह गए


किसानों की ऐसी – की – तैसी करके,
गांधी की पार्टी चल रही है मुस्करा के.
झंडा उठा दिया है सत्ता के खिलाफ,
बस बीफ के मुद्दे को मुद्दा बना के.
दलितों के कपड़े फाड़ कर उनको,
नंगा कर दिया पुलिश वालो ने.
मोदी के मौन के खिलाफ,
साहित्य अकादमी आवार्ड लौटाने वाले,
कलम भी मौन रह गए,
हरिजनों के इस दमन पे.

परमीत सिंह धुरंधर

राममनोहर लोहिया: हमारा भी हक़ है


हम वीरों की धरती के,
वाशिंदे हैं.
हम कारिंदे नहीं,
जो यूँ पगार लें.
इस धरती पे,
हमारा भी हक़ है.
हम कोई पंक्षी नहीं,
जो यूँ आहार लें.
तुम्हे अगर नहीं है स्वीकार,
हमारी समानता,
तो ये तुम्हारी मज़बूरी है.
हम कोई फ़कीर नहीं,
जो अपने पेट पे प्रहार लें.

परमीत सिंह धुरंधर