मैं त्रिलोक बदल दूंगा


मैं अंदाज बदल दूंगा,
परिणाम बदल दूंगा।
होगा अगर कोई रण यहाँ,
तो धरती क्या?
मैं आसमान बदल दूंगा।
क्यों चिंतित हो पिता?
तात श्री के ज्ञान से.
अगर राम, नारायण भी हैं तो,
मैं अपनी तीरों से त्रिलोक बदल दूंगा।
मैं यूँ ही इंद्रजीत नहीं,
मुझे त्रिलोक के सुख की चाह नहीं।
बस आपके जय-जयकार के लिए,
पिता श्री,
मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड बदल दूंगा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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रावण


मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट शिव-शंकर।
वो कैलाश पे विराजे,
मेरे बुलंद हैं इरादे।
उनके ही छात्र-छाया में,
मैं बढ़ रहा निरंतर।
मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट शिव-शंकर।
उनके ही चरणों में,
मैं सर हूँ नवाता।
उनके ही दर्शन से,
मेरा भाग्य खिल जाता।
मैं पुत्र उनका हूँ,
अज्ञानी – अपराधी।
और वो पिता हैं मेरे,
धर्म – ज्ञान के धुरंधर।
मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट शिव-शंकर।
कैलाश को उठाया,
अपने बाजुओं पे.
त्रिलोक को दला है,
मैने अपने बल से.
सब-कुछ है समर्पित,
भोलेनाथ के चरणों में,
उन्ही की आशीष से है,
मेरे साँसों का ये समंदर।
मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट है शिव-शंकर।

 

परमीत सिंह धुरंधर