मेघनाथ तैयार है


तेरे अंग – अंग पे अधिकार करने को
मन व्याकुल है रानी तुझे प्यार करने को.
अपने पिता से कह दो की स्वीकार कर ले हमें
वरना मेघनाथ तैयार है युद्ध आरम्भ करने को.

माना की विष्णु के सखा हैं वो
माना की अजर और अमर हैं वो.
मगर दम्भ मेरा भी उछाल मार रहा
उनको आज यहाँ परास्त करने को.

सोख लूंगा समस्त क्षीरसागर को
अपने तीरों से बांधकर शेषनाग को.
अपने पिता से कह दो की स्वीकार कर ले हमें
वरना मेघनाथ तैयार है त्राहिमाम करने को.

परमीत सिंह धुरंधर

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कौटिल्या – विभीषण – महाभारत : An interesting triangle from Hindu history


अगर वक्षों से नियंत्रित सत्ता होने लगे,
तो किसी को कौटिल्या बनना पड़ता है.
अगर वक्षों पे लालायित सत्ता होने लगे,
तो किसी को विभीषण बनना पड़ता है.
अगर वीरों की सभा में चर्चा अंगों और वक्षों पे होने लगे,
तो किसी को महाभारत रचना पड़ता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

एक बुद्ध ढूंढ रहा हूँ


गहन अन्धकार में
एक सूक्ष्म प्रकाश ढूंढ रहा हूँ.
मैं इस भीड़ में
एक बुद्ध ढूंढ रहा हूँ.
हर ज्ञान, हर रसपान
के बाद जीवन के रहस्य को
भेद पाने का संसाधन ढूंढ रहा हूँ.
मैं इस भीड़ में
एक बुद्ध ढूंढ रहा हूँ.

 

मिले बुद्ध, तो पूंछू,
ऐसा क्या था की यशोधरा का त्याग कर
आप महान बन गए?
और सीता का परित्याग कर
राम आलोचना का पदार्थ।
मैं पूंछू, हे देव,
ऐसा क्या था की नन्हे राहुल को रोते छोड़कर,
आप सम्म्मान के अधिकारी बन गए?
और लव-कुश के पिता होने मात्र से
राम, सर्वत्र निंदा के पात्र।

 

जिसने अहिल्या का मान रखा,
जिसने एक पत्नी व्रत का पालन किया।
जिसने पिता के वचन का मान रखा,
जिसने सबसे मित्रवत व्यवहार किया।
ऐसा क्या गलत किया उस मानव ने?
जो जीवन के अंत में उसे इतनी
पीड़ा, अपमान और दुःख ने ग्रसित किया।
और आपने कैसे इस संसार में खुद को,
इन बंधनों, कलंको से मुक्त किया?

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं त्रिलोक बदल दूंगा


मैं अंदाज बदल दूंगा,
परिणाम बदल दूंगा।
होगा अगर कोई रण यहाँ,
तो धरती क्या?
मैं आसमान बदल दूंगा।
क्यों चिंतित हो पिता?
तात श्री के ज्ञान से.
अगर राम, नारायण भी हैं तो,
मैं अपनी तीरों से त्रिलोक बदल दूंगा।
मैं यूँ ही इंद्रजीत नहीं,
मुझे त्रिलोक के सुख की चाह नहीं।
बस आपके जय-जयकार के लिए,
पिता श्री,
मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड बदल दूंगा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

त्याग की महत्ता


त्याग जीवन में सबसे महत्वपूर्ण और महान काम है.  चाहे कलयुग हो या सतयुग हो, वीर वही है जिसने त्याग किया है. और गुरु गोबिंद सिंह जी से बड़ा त्यागी कोई नहीं। भगवान् राम एक अवतार त्रेता में और गुरु गोबिंद सिंह जी कलयुग में अवतार सिर्फ मानवता  को त्याग की महत्ता बताने के लिए हुआ था.

 

परमीत सिंह धुरंधर

विभीषण – मेघनाथ


पिता से बढ़ के कोई परमात्मा नहीं,
इन चरणों के सिवा ये सर कहीं झुकता नहीं।
मैं अपनी तीरों से सृष्टि का संहार कर दूँ,
मुझे पिता के सिवा, कहीं कुछ भी दिखता नहीं।
तुम भूल गए भ्राता, कुल -संबंधी,
मैं इस जनम में ऐसा द्रोही तो नहीं।
काका श्री, तुम ज्ञानि हो समस्त वेदों को पढ़कर,
मगर मेरी नजरों में, ये पिता के चरणों की धूल भी नहीं।
मेरी जवानी चाहे मखमल पे फिसले,
मेरी जवानी चाहे काँटों पे बिखरे।
आखिरी क्षणों तक बस पिता से प्रेम करूँगा,
चाहे मोक्ष मिले या आत्मा भवसागर में भटके।
मेरी नजरों के सामने हो जाए लंका का पतन,
इस जीवन में ऐसा तो मेरे रहते होगा नहीं।
पिता से बढ़ के कोई परमात्मा नहीं,
इन चरणों के सिवा ये सर कहीं झुकता नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

रावण-मेघनाथ


शेर बनाया हैं मैंने, कोई भीड़ के तो देखे।
ये लाल हैं मेरा, कोई इससे लड़ के तो देखे।
रण में रावण का आना तो बहुत दूर,
कोई मेघनाथ से पहले दो दावँ खेल के तो देखे।
इंद्रा को हरा के जो लौटा था मेरे पास,
प्रिये सुलोचना के लिए, जिसने दिया शेषनाग को पछाड़।
वो लहू है मेरा, कोई ललकार के तो देखे।
शेर बनाया हैं मैंने, कोई भीड़ के तो देखे।
ये लाल हैं मेरा, कोई इससे लड़ के तो देखे।

 

परमीत सिंह धुरंधर