मैं त्रिलोक बदल दूंगा


मैं अंदाज बदल दूंगा,
परिणाम बदल दूंगा।
होगा अगर कोई रण यहाँ,
तो धरती क्या?
मैं आसमान बदल दूंगा।
क्यों चिंतित हो पिता?
तात श्री के ज्ञान से.
अगर राम, नारायण भी हैं तो,
मैं अपनी तीरों से त्रिलोक बदल दूंगा।
मैं यूँ ही इंद्रजीत नहीं,
मुझे त्रिलोक के सुख की चाह नहीं।
बस आपके जय-जयकार के लिए,
पिता श्री,
मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड बदल दूंगा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

त्याग की महत्ता


त्याग जीवन में सबसे महत्वपूर्ण और महान काम है.  चाहे कलयुग हो या सतयुग हो, वीर वही है जिसने त्याग किया है. और गुरु गोबिंद सिंह जी से बड़ा त्यागी कोई नहीं। भगवान् राम एक अवतार त्रेता में और गुरु गोबिंद सिंह जी कलयुग में अवतार सिर्फ मानवता  को त्याग की महत्ता बताने के लिए हुआ था.

 

परमीत सिंह धुरंधर

विभीषण – मेघनाथ


पिता से बढ़ के कोई परमात्मा नहीं,
इन चरणों के सिवा ये सर कहीं झुकता नहीं।
मैं अपनी तीरों से सृष्टि का संहार कर दूँ,
मुझे पिता के सिवा, कहीं कुछ भी दिखता नहीं।
तुम भूल गए भ्राता, कुल -संबंधी,
मैं इस जनम में ऐसा द्रोही तो नहीं।
काका श्री, तुम ज्ञानि हो समस्त वेदों को पढ़कर,
मगर मेरी नजरों में, ये पिता के चरणों की धूल भी नहीं।
मेरी जवानी चाहे मखमल पे फिसले,
मेरी जवानी चाहे काँटों पे बिखरे।
आखिरी क्षणों तक बस पिता से प्रेम करूँगा,
चाहे मोक्ष मिले या आत्मा भवसागर में भटके।
मेरी नजरों के सामने हो जाए लंका का पतन,
इस जीवन में ऐसा तो मेरे रहते होगा नहीं।
पिता से बढ़ के कोई परमात्मा नहीं,
इन चरणों के सिवा ये सर कहीं झुकता नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

रावण-मेघनाथ


शेर बनाया हैं मैंने, कोई भीड़ के तो देखे।
ये लाल हैं मेरा, कोई इससे लड़ के तो देखे।
रण में रावण का आना तो बहुत दूर,
कोई मेघनाथ से पहले दो दावँ खेल के तो देखे।
इंद्रा को हरा के जो लौटा था मेरे पास,
प्रिये सुलोचना के लिए, जिसने दिया शेषनाग को पछाड़।
वो लहू है मेरा, कोई ललकार के तो देखे।
शेर बनाया हैं मैंने, कोई भीड़ के तो देखे।
ये लाल हैं मेरा, कोई इससे लड़ के तो देखे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं मेघनाथ हूँ


मैं मेघनाथ हूँ, मेघनाथ,
पुरे ब्रह्माण्ड में,
कोई नहीं जो मुझे रोक सके.
मैं जब रथ पे होता हूँ,
विराजमान, सारे जहाँ में,
कोई नहीं जो मेरे अश्वो को बाँध सके.
मैं पल में पताका फहरा दूँ,
त्रिलोक में कहीं भी.
मुझसे कोई नहीं छुप सकता,
पुरे ब्रह्माण्ड में कहीं भी.
मैं जब करता हूँ तीरों का संधान,
ऐसा शक्तिमान कोई नहीं रण में,
जो मेरे भीषण प्रहरों से बच सके.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तुम अपनी वेणी में मेरे पुष्प तो लगा के देखो


मैं भीषण तीरों से बाँध दूंगा,
शेषनाग के फनों को.
तुम एक बार तो हमसे,
प्रेम कर के देखो।
मैं इंद्रा को हराकर भी,
अधूरा हूँ तुम बिन.
तुम एक बार अपने नैनों,
के बाण चला के तो देखो।
मेरा तुमसे हैं वादा ए देवी,
तुम यूँ ना अधीर हो.
मैं असुर भले ही हूँ मगर,
मृत्यु तक एक-भार्या नियम में बधूंगा।
तुम अपने मधुर अधरों से,
मुझे प्राणनाथ कह के तो देखो।
ऐसी कोई शक्ति नहीं सृष्टि में,
जो तोड़ सके तुमसे मेरे प्रेम को.
ऐसी कोई अप्सरा भी ना होगी,
जो अब मोह सके इस मन को.
तुम अपनी वेणी में,
मेरे पुष्प तो लगा के देखो।
मैं तुम्हारी लिए,
शिव – विष्णु समस्त, साक्षात परम ब्रह्म,
से टकरा जाऊं।
मैं अपने भीषण बल से,
एक पल में, समस्त क्षीर – सागर सुखा दूँ.
तुम एक बार ह्रदय से अपने भय मिटा के,
मेरे अंक-पास में आके तो देखो।

 

परमीत सिंह धुरंधर

This is based on the first love story of the universe: Meghnaath and Sulochana.

जहाँ राम की हो गयीं जानकी


जहाँ बुध हुए, महावीर हुए,
और दुनिया को मिली शान्ति.
वो धरती है बिहार की,
वो धरती है बिहार की.
जहाँ गंगा बहतीं, गंगा उमरती,
और राम की हो गयीं जानकी.
वो धरती है बिहार की,
वो धरती है बिहार की.
जहाँ गुरु मिले, गोबिंद मिले,
और मिल जाए सबको मुक्ति.
वो धरती है बिहार की,
वो धरती है बिहार की.
जहाँ गुप्त हुए, मौर्य हुए,
और बूढ़े कुँवर ने खडग उठा ली.
वो धरती है बिहार की,
वो धरती है बिहार की.
जहाँ दिनकर हुए, नेपाली हुए,
और बाबा नागार्जुन ने पहनी,
विद्रोह की चोली.
वो धरती है बिहार की,
वो धरती है बिहार की.

परमीत सिंह धुरंधर