मेनका और विश्वामित्र की प्रेम कहानी: सदियों से दबी और कुचली एक सच्चाई


ब्रह्मलोक में ब्रह्मा और माँ सरस्वती के सम्मुख देवराज इंद्रा और सारे देव चिंता ग्रस्त मुद्रा में.
इंद्रा: ब्रह्मदेव, अब आप ही हमारे संकट का समाधान कीजिये।
ब्रह्मदेव: इंद्रा, आपके आने से ही हम समझ गए की आप हमें धर्मसंकट में डालने आ गए हैं.
तभी नारद जी प्रकट हुए.
नारद: नारायण – नारायण, कौन सी संकट की बात कर रहे हैं आप ब्रह्मदेव।
ब्रह्मदेव: पुत्र नारद, इंद्रा देव की चिंता विश्वामित्र हैं.
नारद: अट्हास करते हुए. होना भी चाहिए। स्त्री का मोह रखने वाले ही स्त्री के खोने पे उसकी चिंता करते हैं जो वो उसके समीप रहते नहीं करते।
ब्रह्मदेव: नारद, तुम्हारे शब्द मेरे समझ के बहार हैं पुत्र.
नारद: देव राज, वो देव राज हैं जो अपने आश्रितों को, ख़ास कर स्त्रियों को, युद्ध का हथियार मानते हैं. खुद को बचाने के लिए उनका बलिदान देते हैं. रम्भा का बलिदान भी तो अब उन्हें रम्भा के रूप- रंग की याद दिलाता हैं. इसलिए वीर पुरुष नारी के प्रेम में मौत चुनते हैं, नारी का विरह नहीं, देव राज.
इंद्रा: देव मुनि आप हमेशा मुझ पर गलत आरोप लगाते हैं.
नारद: तो आप ही बताइए देव राज, रम्भा के लिए आप क्या कर रहें हैं? आज भी आप यहाँ हैं, तो सिर्फ विश्वामित्र को रोकने के लिए. मुझे पूर्ण विश्वास है की आपने अभी तक ब्रह्मदेव से रम्भा के संकट हरने का निवेदन नहीं किया होगा। आपसे ये उम्मीद ही बेकार है देव राज.
देव राज: ब्रह्मदेव, देख रहे हैं, देवऋषि मुझ पर कुपित है.
ब्रह्मदेव: तो आप बतावो देवराज, मैं क्या करूँ?
देव राज: आप विश्वामित्र की तपस्या भंग में हमरी मदद करें।
बर्ह्मदेव: देवराज, ये मेरा काम नहीं।
इंद्रा: ब्रह्मदेव, मैंने इस बार मेनका को भेजने का निर्णय लिया है.
नारद: ओह्ह, तो क्या देवराज रम्भा का हाल भूल गए या उन्हें मेनका पर विश्वास हैं?
इंद्रा: ना मैं रम्भा को भुला हूँ, ना मुझे ये विश्वास है की मेनका कुछ कर पाएंगी। इसलिए, मैंने काम देव को विश्वामित्र का मन असंतुलित करने को कहा है।
नारद: तो अब आप ब्रह्मदेव से क्या चाहते हैं? क्या आप उनको भी काम देव की तरह मन मोहने का काम कहेंगे।
देव राज: नहीं। मैं तो सिर्फ इतना चाहता हूँ की प्रभु कुछ करें ताकि काम देव और मेनका अपने उद्देश्य में सफल हो कर लौटें।
ब्रह्मदेव: हम क्या करे, देव राज. आप ही बताइए।
देव राज: अगर हमें ज्ञात होता, तो हम क्या आपके पास आते?
कुछ समय के मौन के बाद ब्रह्मदेव बोले, ” ठीक है देव राज, आप जाइये। हम देखते हैं की क्या कर सकते हैं.”
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ब्रह्मदेव: उठो विश्वामित्र, उठो. हम तुम्हारी तपस्या से प्रभावित हैं.
विश्वामित्र: ब्रह्मदेव आपके दर्शन से मैं अहोभाग हुआ.
ब्रह्मदेव: तुम वर मांगो विश्वामित्र और ये तप छोड़ दो.
विश्वामित्र: आप के दर्शन ही मेरा वर है. लेकिन तप कैसे छोड़ दूँ, इसके लिए ही तो राज – पाट छोड़ा है.
ब्रह्मदेव: तुम्हारा तप सृष्टि में प्रलय ला रहा है पुत्र. तुमने रम्भा को पाषाण बन दिया। इंद्रा तुम्हे तप-मार्ग से हटाने के लिए फिर से कोई अप्सरा भेजेगा।
विश्वामित्र: ब्रह्मदेव, आप मेरी चिंता न करे. मेरा मार्ग अब कोई नहीं बदल सकता। मैंने अपनी कितनी पत्नियों को छोड़ा है, उनका शरीर, उनका सौंदर्य, उनका लावण्या, उनका मोह -प्यार सब, कब का छोड़ दिया है. तो इंद्रा की सुंदरियों में वो बात कैसे होगी की मुझे बाँध ले.
ब्रह्मदेव: विश्वामित्र, हम जानते हैं की तुम्हे कोई नहीं डिगा सकता। लेकिन पुत्र, तुम्हारा नहीं डिगना मेरी पराजय होगी। मेरी अपूर्णता होगी। अथार्थ, हम त्रिदेवों की हार होगी। क्या तुम चाहते हो की मैं सारी उम्र सबकी हंसी का पात्र बन के रहूं?
विश्वामित्र: वो कैसे?
ब्रह्मदेव: मैंने स्त्री की सृष्टि ही इसलिए किया है की वो किसी के मन को भी छल ले, उसे अपने वश में कर ले और समय आने पे उसे धोखा दे. इन तीनो गुणों में पुरुष कुछ भी नहीं है स्त्री के आगे. स्वयं, मैं भी अपनी ही सृष्टि, एक नारी, के सौंदर्य से छाला गया और भगवान् शिव ने मेरे पांचवे मस्तक का नाश किया, मुझे उस मोह से मुक्त करने के लिए. क्या तुम चाहते हो, की सारी सृष्टि कहे की जिससे मैं नहीं बच पाया, उसे विश्वामित्र ने प्रभावहीन कर दिया?  ये मेरी और मेरी सृष्टि की हार होगी। उस के बाद मेरे लिए सृष्टि करना असम्भव होगा और प्रलय बिना आये भी सृष्टि रुक जायेगी। पुत्र, मेरी एक विनती स्वीकार करो. मेरे लिए, मेरी सृष्टि के लिए, नारी से हार स्वीकार कर के, मेरी सृष्टि को सम्पूर्ण रहने दो.
विश्वामित्र: तो आप बताइए, मैं क्या करूँ?
ब्रह्मदेव: पुत्र, इस बार जब मेनका आये तुम्हारा मन मोहने, तो उसका हाल रम्भा सा ना करना। तुम उसका प्रणय स्वीकार कर लेना। स्त्री की जीत में तुम्हारी हार नहीं, क्यों की मैंने ऐसी ही सृष्टि बनायीं है. लेकिन मेनका को त्रिस्कार करने से नारी के साथ मेरी भी हार होगी।
विश्वामित्र: इतनी सी बात ब्रह्मदेव। जाइये, यही होगा। मैं मेनका का प्रणय स्वीकार कर लूंगा और जब तक आप कहेंगे उसके साथ गमन करूँगा।
ब्रह्मदेव: धन्य हो विश्वामित्र, तुम धन्य हो. तुम सही अर्थों में ब्रह्मऋषि हो. जिसने आज स्वयं ब्रह्मदेव की मनोकामना पूर्ण की. पुत्र मैं तुम्हे कुछ देना चाहता हूँ. इंकार मत करना।
ब्रह्मदेव: मैं तुम्हे आशीष देता हूँ की तुम सारे ब्रह्मऋषियों के सप्तऋषि बनके सृष्टि के अंत तक इस जगत में उदयमान रहोगे।
विश्वामित्र: जैसी आपकी मनोकामना, ब्रह्मदेव।
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विश्वामित्र की चारो तरफ गुणगान होने से, ब्रह्मणनों में हाहाकार मच जाता हैं. और ब्राह्मणों ने फिर चतुराई दिखाते हुए, इंद्रा के सहयोग से, मेनका को समझाया की वो विश्वामित्र को छोड़ दे. उन्होंने मेनका को ये लालच दिया की आपका नाम घमंडी विश्वामित्र का घमंड तोड़ने के लिए सदा -सदा अमर रहेगा। सृष्टि आपका आभार मानेगी। ब्राह्मणों ने कहा की विश्वामित्र का प्रेम सच नहीं और उसने ब्रह्मदेव के कहने में तुम्हारा पाणिग्रहण किया है. इंद्रा ने मेनका को अप्सराओं में सबसे महान बनने  का लालच दिया।
इंद्रा : मेनका, जो काम रम्भा, उर्वशी नहीं कर सकी. वो तुमने किया। तुम्हारा सौंदर्य अनुपम है. तुम अप्सराओं की अप्सरा हो. क्या तुम चाहती हो की सारी सृष्टि तुम्हे ये कहे की तुम वो काम नहीं कर सकी? तुम्हारा विश्वामित्र के साथ रहना, तुम्हारी हार और विश्वामित्र की जीत होगी।
इंद्रा: सोचो मेनका, एक नारी होकर, क्या तुम नारी के अपमान का बदला नहीं लोगी? इस विश्वामित्र ने ना सिर्फ रम्भा का अपमान किया, बल्कि इसने हज़ारो अपनी पत्नियों को उनके यौवन की आग में अकेला छोड़ दिया। इसने उनका हाथ थामा था, लेकिन ब्रह्मऋषि कहलाने के लिए उनको बीच में छोड़ दिया। क्या तुम उन सभी के अपमान का बदला नहीं लोगी?
इस तरह दोस्तों, मेनका ने सम्पूर्ण नारी जगत के अपमान का बदला लेने के लिए, ना सिर्फ अपने प्रेम को, प्रेमी को छोड़ दिया, बल्कि अपनी नन्ही लड़की को बिना दूध पिलाए, स्वर्ग लौट गई. और अंत में ब्राह्माणवाद की जीत हुई.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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विश्वामित्र और मेनका


मुझे कोई उपेक्षा नहीं,
की तुम सीता – सावित्री बन के रहो,
मगर ये भी तो कहो,
जब कह ही रही हो खुद ही,
की अब तक कितनो को,
सीता – सावित्री बनके छला है.
मैं उन पंडितों में नहीं जिन्हे बस,
विश्वामित्र का दम्भ ही दिखा है,
मैं वो पंडित हूँ,
जिसकी कलम ने हमेसा,
मेनका को बस चरितहीन ही लिखा है.
भूख से बिलखते बच्चे को जिसने छोड़ा,
बस इंद्रा और सवर्ग के चाह में,
लिखते रहे सब उसको बस नारी की विवसता,
मैंने उसको बस व्याभिचार ही लिखा है.

परमीत सिंह धुरंधर

विश्वामित्र – मेनका: एक प्रेम कथा या बलात्कार


विश्वामित्र – तुम मेरा प्रेम ठुकरा कर उस इंद्रा की सभा में नाचना चाहती हो. मैंने वैसे कितने इन्द्रलोक बना कर छोड़ दिए मेनका।
मेनका – तुमने इन्द्रलोक तो जरूर बनाये विश्वामित्र, पर तुम कभी भी स्वयं इंद्रा नहीं बन पाये।
विश्वामित्र – तो क्या तुम्हारा प्रेम सिर्फ इंद्रासन पे बैठे व्यक्ति से है? अच्छा है, मैं कभी इंद्रा नहीं बना! मैं अपने प्रेम को हारते तो देख सकता हूँ, लेकिन बिकते नहीं।
मेनका – प्रेम क्या है? विशवमित्र पहले ये तो जान लो फिर हारने और बेचने की बात करना। मैं तो जिससे प्रेम करती हूँ उसके लिए तुम क्या, रावण के पास भी चली जाऊं। तुम प्रेम की बात करते अच्छे नहीं लगते, जिसने एक पशु को पाने की जिद्द पे अपनी हज़ारों रानियों को छोड़ दिया।
विश्वामित्र – मेनका। मैंने उनको नहीं छोड़ा, वल्कि अपना सबकुछ छोड़ दिया। उनका कुछ नहीं छिना है. और मैंने अपने स्वार्थ के लिए उनका जिस्म और चरित्र तो दाँव पे नहीं लगाया है. मैंने तुम्हारे प्रेमी की तरह उन्हें वशिष्ठ के पास तो नहीं भेजा।
मेनका – हाहाहाहा! विश्वामित्र, चरित्र बुढ़ापे की चादर है, जवानी को इसकी जरुरत नहीं। और मैं तो चिरकाल तक योवन की मालिक रहूंगी।
विश्वामित्र – तो ये कैसा योवन है तुम्हारा मेनका? तुम इस योवन से अपने प्रेमी की प्यास भी नहीं मिटा सकती। जो कभी भटकता हुआ अहिल्या तो कभी दस्यु-सुंदरियों की चरणो में लेटता है. वो तुम्हे नाचता तो जरूर है मेनका, लेकिन वो अधिकार नहीं देता जो देवी शुचि को प्राप्त है.
मेनका-ये चरित्र, ये अधिकार, ये गौरव मिथ्या शब्द हैं तुम जैसे हारे हुए पुरुष ढाल बना लेते हैं अपनी नपुंसकता छुपाने के लिए. जिनके योवन में आकर्षण नहीं, जो प्यास नहीं जगा सकती, वैसी नारियां ही ये धारण करती हैं. चरित्र कभी भी स्त्रियों का आभूषण नहीं रहा. तुम जिसे चरित्रहीनता समझते हो, वो तो स्त्रियों का असली आभूषण है. अगर हम ऐसा नहीं करे तो फिर क्या हमारा योवन। भोग पुरुषों के लिए पाप के रूप में वर्णित हैं वेदों में, हम स्त्रियों के लिए नहीं।
मेनका – विश्वामित्र, मैं तुम्हे उस सुख सुविधा के लिए तो नहीं छोड़ रही, ना ही अमरत्व के लिए स्वयं से इंद्रा के पास जा रही हूँ. मैं तुम्हे छोड़ रही हूँ क्यों की इंद्रा मुझे चाहने लगे हैं. मैं तुम्हे पहले दिन ही छोड़ देती अगर उन्हें मेरी याद आती. मैं इतने दिन तुम्हारे साथ रही, ये मेरा प्रेम नहीं था. ये तो तुम्हारी अज्ञानता हैं, तुमने मेरे मन को कभी समझा ही नहीं की. तुम तो मेरा शोषण करते रहे, मेरा वलात्कार करते रहे.
विश्वामित्र – मेनका!!!
मेनका – हाँ विश्वामित्र, तुमने मेरा वलात्कार किया है इतने साल, हर एक रात, हर एक पल. और तुम कैसे सोच रहे हो की मैं, एक स्त्री, एक वलात्कारी के साथ रहूंगी। मैं तो तुम्हे छोड़ देती अगर वशिष्ठ मुझे चाहते, क्यों की वो ही धरती पे तुमसे श्रेष्ठ हैं.
विश्वामित्र – तो क्या प्रेम सिर्फ श्रेष्ठ आभूषण की चाहत हैं.
मेनका – हा हा !! विश्वामित्र, तुम कभी ज्ञानी नहीं हो सकते। मैं तो कल इंद्रा को भी छोड़ दूँ अगर नारायण, महादेव या ब्रम्हदेव मुझे चाहने लगे. और मुझे इंद्रा इसलिए पसंद है की वो मुझे तुम्हारी तरह, प्रेम-प्रेम कह कर नहीं रोकेगा। वो तो खुश रहेगा ये सोच कर की कुछ पल तो आंनद के मिले।

परमीत सिंह धुरंधर

दूध पिलाती मेनका


बिन पैसे का प्रेम दिखा दे,
तो मैं भी बिक जाऊं तुझपे।
माँ जैसी सच्ची कोई महबूब दिखा दे,
तो मैं भी बिक जाऊं तुझपे।
कब तक,
नारी देवी है- इसका जय-घोष करोगी।
बस दूध पिलाती मेनका दिखला दे,
तो मैं भी बिक जाऊं तुझपे।

परमीत सिंह धुरंधर

परमीत और मेनका


वो रात भर मेरी बाँहों में,
रक्त का संचार बनी,
मेरे हृदय कि धड़कने,
मेरी साँसों कि रफ़्तार बनी.
इन काली-काली रातो में,
मेरे जीवन का आधार बनी.
उड़-उड़ के उनकी जुल्फे,
गिरती  हैं  मेरे मुखड़े पे,
आँचल ढाल कर उनके काँधे से,
लिपटा है मेरे सीने से,
मासूमियत से दूर,
वो मेरी मुस्कान बनी.
इन काली-काली रातो में,
मेरे जीवन का आधार बनी.
अधखुली पलकों से,
वो देखती हैं मेरे तन को,
अभी भी दबी,
अपने सरमोहया के बोझ से.
उनके योवन कि खामोसी,
मेरी जवानी कि चीत्कार बनी.
पल में वो दूर जाती,
पल में पास आ रही,
अपनी जुल्फो कि उलझन से,
खुद उलझती जा रही.
उनकी ये विवसता,
मेरा राजपूती अहंकार बनी.
न रोसनी कि चाहत,
न उची उड़ान कि,
लगता हैं प्यारा अब ये अंधकार,
उनकी जुल्फे मेरी पाश बनी,
लो टूट रहा मेरा ब्रह्मचर्य परमीत,
वो मेनका-अवतार बनी.

मेनका और अरविन्द केजरीवाल: पार्ट I


स्वर्गलोक में सभी देवतावों के बीच देवराज इंद्रा का खामोश और झुका चेहरा देवगुरु बृह्श्पति कि चिंता का कारण है. तीन दिनों से नाचती उर्वशी थककर बेहोश हो चुकी है, मगर इंद्रा कि नजरों ने जाम के एक बूंद को भी ओठों से नहीं लगाया।
नारद मुनि का आगमन, देवतावों का उनको कौतहूलता के साथ देखना। नारद: प्रणाम देवगुरु।
देवगुरु: स्वागत है नारद।
नारद: क्या हुआ है देवगुरु, देवराज इस कदर किस सुंदरी के रस का पान कर रहे है.
देवगुरु: नारद, वो देवराज ही क्या जो सुंदरियों का स्वामी न हो. मगर चिंता ही ये है कि अब देवराज का सुंदरियों से मोहभंग हो गया है. उर्वशी, रम्भा और तो और अब वे देवी रति कि बाहों में भी अशांत रहते हैं. पिछले चार दिनों से तो वो किसी के पास गये भी नहीं।
नारद: इसमें इतनी चिंता का क्या विषय है, जब लालशा जागेगी तो चले जायेंगे।
देवगुरु: नारद, मनुष्यों कि तरह मत बात करो जो हर चीज़ ये सोच के रखते है कि कल उसका पान करेंगे। अंततः, उन सब चीज़ो का पान कोई और करता है. सब छोड़ दो, तो भी इन अप्सराओं का क्या करें। अब तो धरती पे कोई योग पुरुष या मुनि भी नहीं जो इनको भोग करें। धरती पे अब कोई बलवान रावण भी नहीं, जिनसे इनका अपहरण का स्वांग रचे. सामान्य मानुष अगर इनका भोग करेगा तो फिर इनका मोल ही क्या रहेगा।
नारद: मन में सोचते है कि देवगुरु पागला गये हैं मैंने कब कहा कि इन्हे धरती पे भेज दो.
देवगुरु: क्या सोच रहे हो नारद। अरे नारद, जब रात गहराती है और ये अप्सराएं कई-कई दिनों तक जब सज संवर के रातो को प्रेम रस का पान करने में असमर्थ रहती है,तो मेरे समर्थ आके मेरे ही चरित्र कि परीक्षा ले ने लगती है. लगता है नारद, इस कलियुग में आके कहीं मेरा गुरुपद न छीन जाएँ।
नारद: तो क्या बाकी देवों का इनके कौमार्य से मोह भंग हो गया है?
देवगुरु: तुम भी नारद, ये क्या बातें कर रहे हो. अरे, स्त्री ही वो आनंद है, जिसे अँधा बिना देखे ही देखता है और लूला बिना छुए भी उसके स्पर्श का सही और सच्चा पान कर सकता है.
नारद: देवगुरु, सीधे -सीधे कहिये।
देवगुरु: नारद। सत्ता और शासक के लिए ही स्त्री का उद्भव हुआ है, और स्त्री भी शासक द्वारा शासित हो कर ही सुख को धारण करती है. कोई भी अप्सरा ज्यादा दिनों तक इंद्रा कि बाहों से दूर नहीं रह सकती। अरे इन लोगो ने अन्य देवों को अपने शयनकक्ष में आने से मना कर दिया है.
नारद: तो क्या इंद्रा ने अपने प्रिये मेनका का भी त्याग कर दिया है?
देवगुरु: नहीं नारद। लेकिन ये ही तो चिंता का विषय है. मेनका यहाँ सवर्गलोक में नहीं है. वो धरती पे विचरण करने गयी है.
नारद: तो बुला लिजिये…, हँसते हुए…..
देवगुरु: ये इतना आसान होता तो हम कर चुके होते। वो आज कल एक पुरुष के जीवन को जी रही है. और उसको यहाँ तब तक नहीं ला सकते जब तक विधि का विधान न हो.
नारद: पुरुष के जीवन को ! ये क्यों और कौन है वो पुरुष?
देवगुरु: ये सब श्राप के चलते हो रहा है, मेनका शापित हो के सब भूल चुकी है और इस जीवन में धरती पे श्री अरविन्द केजरीवाल का जीवन जी रही है.
ये सुनकर नारद गायब हो जातें है, वो धरती पे मेनका रूपी अरविन्द केजरीवाल के दर्शन को चले जाते हैं. उन्हें इस बात का पता ही नहीं चला कि कब मेनका शापित हो कर केजरीवाल के रूप में धरती पे अपनी लीला करने चली गयी.

Menka, Amrapaali and Arvind Kejriwaal: Trimurti of Personal Goal.


There is a similarity between the story of Vishamitra-Menka and the story of Amrapaali-Azadshatru. Menka left her husband and child. She cried and complained about her duty. Similarly, Amrapali always complained against the society but she refused to go with Azadshatru, when there was a chance. The moral of the story is not that women were suppressed during that time, but it is that both refused to do so just to achieve same personal goal. Therefore, they used others to fulfill their dream or ambition. In that process they harmed the good people and supported the bad people.

Arvind Kejriwaal is playing a role of modern-day Amrapaali. Like her, he always complains against everyone but he refused to change the system, when there was an opportunity for him. So on based of these two stories, I can tell that people associated with him will suffer and they will not get anything at the end. He is going to fulfill just his agenda. Such people cannot see anything except their personal goal. Menka wanted to get the position what Rambha had, Amrapaali wanted to be the most beautiful and powerful women at that time, and Kejriwaal wants to ………

The bottom line is that ambitious people never work for welfare of the society. They do that just to get the power.