द्रौपदी


सुरक्षा की उमीदें पतियों से लगा कर,
द्रौपदी बैठी थी श्रृंगार करने,
युधिष्ठिर से धर्म निभाकर।
अपने सामर्थ्य को भुला दिया,
पिता-भाई के बल को देखकर।
आंसू बहा रही थी,
अधर्मियों को धर्म बता कर।

परमीत सिंह धुरंधर

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धर्मराज


जहाँ पतियों ने खेली बाजी,
अपनी किस्मत बदलने को,
और दावँ पर लगाया पत्नी को,
बस खुद को बचाने को.
जब हुआ अपमान उस स्त्री का,
तो नजरे झुका ली सबने, परमीत
बस धर्मराज कहलाने को.