भीष्म और बरगद


मेरी लड़ाई
मेरे अस्तित्व की नहीं
मेरे अंतरात्मा की बन गयी है.
मेरे सही या गलत की नहीं
मेरे विश्वास की बन गयी है.

मैं जानता हूँ
की मैं टूट रहा हूँ
पिछड़ रहा हूँ
थक रहा हूँ
पर इन सबके बावजूद
मेरा टीके रहना जरुरी है
उस बरगद की तरह
जिसके नीचे क्या ?
दूर – दूर तक कोई और पेड़ – पौधा
नहीं होता।

जी हाँ जब जिंदगी आप की
बरगद हो तो
लोग दूर -दूर ही रहते हैं
की कहीं विकास ना रुक जाए.
कहीं भुत – पिचास न पकड़ ले.
ये तो वो ही इनकी छावं में आते है
बैठते हैं
जो मुसाफिर हों, राही हो
जिनकी मज़बूरी है थकान मिटाने की.
या फिर प्रेमी-युगल हो
जिनकी मज़बूरी हो निवस्त्र हो कर भी
एक वस्त्र या चादर के आड़ की.

बरगद, जिसके कोई करीब नहीं
बरगद, जिसके फल की किसी को चाह नहीं।
बरगद, जिसके गिरने पे आँधियों में
एक धाराम सी आवाज होती है
और गावं समझ जाता है
और जब गिरता है बरगद तो
या तो रात का अँधेरा और सनाटा होता है
या फिर ऐसा तूफ़ान जो दिन में भी
सबको घरों में छिपने को विवस कर दे.

तब उस अँधेरे से और उस तूफ़ान से सिर्फ
वो बरगद ही जूझता है.
और वो गिरना भी देखिये
की उसी पल से लोग उत्सव मनाते हैं
बच्चे उछाल -उछाल कर लांघते हैं
विजय-उल्लास की तरह.
और लोग ज्यादा -ज्यादा धो लेना चाहते हैं
उसे चूल्हे या अलाव में लगाने को.
गिरना भी ऐसा हो और मौत भी ऐसा हो
की जन-सैलाब उमड़ उठे.
भीष्म की सैया पे
पांडव – कौरव क्या?
कर्ण, दुर्योधन, गांधारी, धृतराष्ट,
ही नहीं
स्वयं जगत के पालनहारी
कृष्णा कराह उठे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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कौटिल्या – विभीषण – महाभारत : An interesting triangle from Hindu history


अगर वक्षों से नियंत्रित सत्ता होने लगे,
तो किसी को कौटिल्या बनना पड़ता है.
अगर वक्षों पे लालायित सत्ता होने लगे,
तो किसी को विभीषण बनना पड़ता है.
अगर वीरों की सभा में चर्चा अंगों और वक्षों पे होने लगे,
तो किसी को महाभारत रचना पड़ता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

गर्भ से ही निकला हूँ करके तैयारी


जो प्रेम करता है पिता से,
वो होता है विलक्षण – प्रलयंककारी।
श्री राम, परशुराम, मेघनाथ, भीष्म, कर्ण,
अब है अभिमन्युँ की बारी।

बस पिता ही पूज्य हैं इस जीवन में,
बस वो ही विराजमान हैं ह्रदय में.
स्वीकार है, हर जख्म – हर घाव,
पुरस्कार है मौत भी इस पथ पे.

कितने भी हो आप भयंकर योद्धा,
महारथी और चकर्वर्ती,
क्या बांधेंगे मुझे इस चक्रव्यूह में?
गर्भ से ही निकला हूँ करके इसी दिन की तैयारी।
जो प्रेम करता है पिता से,
वो होता है विलक्षण – प्रलयंककारी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

वो ही कृष्णा है


जो मधु से मधुकर,
जो सूक्ष्म से सूक्ष्मतर,
जो भय से भी भयंकर,
वो ही कृष्णा है.

जो प्रबल में प्रबलतम,
जो न्यून में न्यूनतम,
जो श्रेष्ठ में श्रेष्ठतम,
वो ही कृष्णा है.

जो सागर में समुन्दर,
जो चिर में निरंतर,
जो अमृत के सामानांतर,
वो ही कृष्णा है.

जो कण – कण में सम्माहित,
काल में प्रवाहित,
काम-तप-रज में संचालित,
वो ही कृष्णा है.

जो भूखंड के खंड में,
पुष्प के मकरंद में,
जो आनंद – विरह के क्षण में,
वो ही कृष्णा है.

जो नारी के सौंदर्य में,
शिशु के बालपन में,
और प्रेयसी के आलिंगन में,
वो ही कृष्णा है.

जो रण में,
शयन में,
मन के हर चुभन में,
वो ही कृष्णा है.

जो शिव के तांडव में,
इंद्रा के विलास में,
सरस्वती के ज्ञान में,
वो ही कृष्णा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

वो कृष्णा हैं


जो रिश्ते में बंध के भी ना बंधे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो प्रेम में बंध के भी ना बंधे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो रणभूमि में स्थिर हो कर भी युद्ध करे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो भीष्म के संगती में भी,
विदुर का साग खाये,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो त्रिलोकी हो के भी,
सुदामा को ताज दे दे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो भक्तों का क्रोध – ताप,
हंस के सह ले,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो राधा के मन में हो,
और रुक्मिणी संग चरे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो अलौकिक – अद्भुत होके भी,
कण – कण में विराजे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो सबको मोहित कर,
स्वयं निर्मोही रहे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो सबको साध्य कर,
स्वयं असाध्य रहे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो काल को संचालित कर,
स्वयं कालचक्र से ग्रसित हो,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो पांडवों संग रह कर भी,
कौरवों के संग प्रतिपल में विराज करे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.
जो अपने – पराये का भेद छोड़ कर,
सुदर्शन को संचालित करे,
वो कृष्णा हैं, वो कृष्णा हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अर्जुन – पुत्र अभिमन्यु


यूँ ही धरा पे,
अब नहीं धीरज धरूँगा,
तुम कहोगे,
तो आज से ही युद्ध होगा।
साँसों के आखिरी क्षणों तक,
भीषण संग्राम होगा।
लाएंगे तुम्हारे स्वप्न, या फिर,
कुछ नया ही अंजाम होगा।
मुठ्ठी भर हैं, तो ये मत सोचो,
की मसल दिए जाएंगे।
आज ग्रहों-नक्षत्रों,
और स्वयं सूरज तक,
अर्जुन – पुत्र अभिमन्यु का,
तेज होगा।
भीषण – बाणों की बर्षा होगी,
चारों दिशाओं से.
जर्रे – जर्रे पे आज, सुभद्रा – पुत्र,
के रथ का निशान होगा.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अभिमन्यु – दुर्योधन संवाद


अभिमन्यु को देखकर दुर्योधन अट्टहास करता हुआ बोला, “अभी बालक हो, लौट जाओ. अभी तो तुमने जीवन में कुछ किया ही नहीं। तुम यूँ अपने जीवन को बेकार मत करो.”
अभिमन्यु ने सबको प्रणाम करने के बाद कहा,
” जीवन में मधुरता प्यार से हैं,
जीवन की प्रखरता कर्म से है,
मगर जीवन की महानता त्याग से है.
इन तीनो के बिना जीवन कुछ नहीं,
और जब जीवन नहीं तो फिर धर्म क्या?”
दुर्योधन ने कहा, “अगर जीवन प्रेम और त्याग है, तो क्या तुम्हे अपने बंधुओं से प्रेम नहीं? क्या तुम उनके जीवन के लिए ये सत्ता का त्याग नहीं कर सकते?”
अभिमन्यु, “प्रेम तो बहुत है. और हमने त्याग भी किया था. आज भी ये लड़ाई हम सत्ता के सुख के लिए नहीं लड़ रहे. अगर लड़ाई सत्ता के सुख की होती तो मैं इस कुरुक्षेत्र में नहीं खड़ा होता। यह हमारा संघर्ष है आपके अत्याचार के खिलाफ। यह संघर्ष है आपकी निरंकुशता के खिलाफ, आपके लोभ, और आपके दमन के खिलाफ।”
अभिमन्यु, “तात श्री, बिना संघर्ष का त्याग, त्याग नहीं; बिना संघर्ष के प्रेम, प्रेम नहीं और बिना संघर्ष के कर्म, कर्म नहीं। अथार्थ, मानव के जीवन की हर परिभाषा और उसकी जवानी बिना संघर्ष के कुछ नहीं। हमारी ये लड़ाई न तो सत्ता के लिए है, ना आपके दमन के लिए. ये हमारा संघर्ष है इस समाज से, जिसके आप चालाक और पालक हो. हम चाहते हैं की इसको बदल दे, और ये संघर्ष है उस बदलाव के लिए.”

 

परमीत सिंह धुरंधर