मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का


ए चाँद मेरी गलियों में
आना – जाना छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.

जिसने धारण किया है
विष को अपन कंठ में
उसके अधरों के पान की
अभिलाषा छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.

भूत – भभूत – डमरुँ
पे जो रीझ जाए
उसपे नयनों के
तीर चलाना छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.

जब – जब आस टूटती है
मानव की
तब प्रभु शिव हरते हैं
पीड़ा भक्तों की.
मुझे ऐसी भक्ति से
भटकाना छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.

मुझसे भी बलिष्ठ और कर्मनिष्ठ
बहुत है यहाँ।
इस अवघड-फ़कीर को
आजमाना छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

Advertisements

वैराग


पल – पल में इरादों का विखंडन होता है
पल – पल में इरादों का सृजन होता है.
ये संसार तो अनंत है, अनंत ही अनंत है
यहाँ एक युद्ध में हार से
नहीं जीवन का कभी अंत होता है.

स्वयं जो इस सृस्टि का ब्रह्म है
उस साक्षात् शिव को भी
विष का करना पान होता है.
पल – पल में जीवन का त्रिस्कार होता है
पल – पल में जीवन का अपमान होता है.
जो इनसे परे होकर ना विशलित हो कभी
शिव के समक्ष वही वैराग होता है.

मैं फिर पुलकित होऊंगा ए मेरी शाखाओं
फिर वही पुष्प और फल धारण करूंगा मेरी शाखाओं
की हर पतझड़ के बाद विकसित वसंत होता है.
पल – पल में जीवन का विनाश होता है
पल – पल में जीवन का आरम्भ होता है.
ये संसार तो अनंत है, अनंत ही अनंत है
यहाँ एक युद्ध में हार से
नहीं जीवन का कभी अंत होता है.

परमीत सिंह धुरंधर

पिता बन कर


हर जनम में पिता बन कर
हे प्रभु शिव
रखों मेरे सर पे अपना हाथ.
और मैं पुत्र बनकर
आपके चरणों को धो के पीता रहूँ
जपता रहूँ आपका नाम.

 

परमीत सिंह धुरंधर

रोम – रोम से गजानन हम आपका गुणगान कर रहे


प्रभु आप जब से जीवन को साकार कर रहे,
रोम – रोम से गजानन हम आपका गुणगान कर रहे.
चक्षुओं को भले प्रभु आपका दर्शन ना मिला हो,
हम साक्षात् ह्रदय से परमानंद का आभास कर रहे.

अद्भुत है आपका अलंकार देवों में,
स्वयं महादेव भी ये बखान कर रहे.
लाड है, प्यार है माँ पार्वती को आपसे,
जग में शक्ति को प्रभु आप स्वयं सम्पूर्ण कर रहे.

मैं भिखारी हूँ, भिक्षुक हूँ दर का प्रभु आपके,
कृपा है प्रभु आप मुझपे नजर रख रहे.
आपके चरण-कमलों में हो मस्तक मेरा भी,
बस इसलिए प्रभु हम आपका नाम जप रहे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हमारी लाज रे


पिता तुम तो हो कैलाश पे,
मैं हूँ यहाँ निराश रे.
तन – मन थकता ही जा रहा,
छोड़ गए विष्णु-ब्रह्मा सब साथ रे.

विकट प्रण धारण कर,
मैं निकला था शान में.
कंठ मेरे सुख चले अब,
और संकट में हैं प्राण रे.

साँसों को अब कोई आस नहीं,
ह्रदय में विश्वास नहीं।
तुम पुलकित कर दो ये पुष्प,
प्रचंड इन धाराओं में,
और रोक दो मेरा मान-मर्दन, उपहास रे.

हम रघुबंशी, हम सूर्यबंशी,
फिर भी कुल है आज कलंकित मेरा।
नाथ बनो, सनाथ करों, हे त्रिपुरारी,
अब तुम्हारे कर कमलों में हैं हमारी लाज रे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ए शिव मुझको दे दो इतनी शक्ति ना


मैं समंदर को हलक से पी जाऊं,
ए शिव मुझको दे दो इतनी शक्ति ना.
सारे अमृत त्याग दूँ, और गरल पी जाऊं,
ए शिव मुझको दे दो इतनी शक्ति ना.
जीवन का हर अपमान पी जाऊं,
मुस्करा कर दुश्मनों से मिलूं।
तन्हाई हो बस मेरी, मैं अलख जगा दूँ ना.
ए शिव मुझको दे दो इतनी शक्ति ना.
अब कोई मेनका जो धरती पे अवतरित हो,
तो ना छला जाऊं, मैं विश्वामित्र सा.
राम सा मन को सयम में मैं बाँध जाऊं,
ए शिव मुझको दे दो इतनी शक्ति ना.

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

शिव आप ही मेरी आत्मा


शिव आप ही मेरी आत्मा,
शिव आप ही हो मेरे परमात्मा।
शिव, आप को ही है मुझे पाना,
ये ही है मेरी कामना, ये ही है मेरी उपासना।
शिव, मुझे उद्दंड बना दो,
शिव, मुझमे घमंड भर दो.
पर सदा चरणों में अपने रखना,
ये ही है मेरी कामना, ये ही है मेरी उपासना।
धरती से आकाश तक, प्रलय मचा दूँ,
त्राहिमाम मचा दूँ,
हाहाकार मचा दूँ.
मुझे अमृत नहीं, आप सा विष ही है चखना,
ये ही है मेरी कामना, ये ही है मेरी उपासना।
शिव आप ही मेरी आत्मा,
शिव आप ही हो मेरे परमात्मा।
शिव, आप को ही है मुझे पाना,
ये ही है मेरी कामना, ये ही है मेरी उपासना।

 

परमीत सिंह धुरंधर