मन


हौले-हौले बहती है गंगा, हिमालय की ऊँचाइयों से ढल कर,
ए मन तू न हो अधीर यूँ किसी की नजरों में गिरकर।

परमीत सिंह धुरंधर

शिवमई गंगा


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लहरा कर बोले शिवशंकर,
बांध लूँगा गंगा को इन्ही ज्टावों में,
तो हंस कर बोली गंगा,
जाउंगी पाताललोक,
शिवशंकर,
कमंडल ये साथ लेके.
हर-हर शिवशंकर,
हाहाकार गंगा,
शांत-अविचल शिवशंकर,
प्रलयंकारी गंगा.
उफनती,
गरजती,
जो चल दी धाराएं,
तो डोली ये धरती,
और,
कांपी दिशाएं,
थर्राने लगा,
जो कैलाश भी थर-थर,
तो योगी की,
टूटी गहरी निन्द्राएं.
तमक कर बोले शिवशंकर,
बांध लूँगा गंगा को इन्ही ज्टावों में,
तो हंस कर बोली गंगा,
जाउंगी पाताललोक,
शिवशंकर,
कमंडल ये साथ लेके.
निश्छल भोले शिवशंकर,
विध्वंशकारी गंगा,
परोपकारी शिवशंकर,
तेजमयी गंगा.
आगे-आगे भागीरथ,
पीछे विध्वंश,
धुल-धुश्रित भागीरथ,
मन में मचा एक द्वन्द.
क्या हो जायेगा सृष्टीका,
आज यहाँ अंत,
क्या मिट न सकेगा,
कुल से मेरे ये कलंक.
व्याकुल मन से,
पुकार उठे भागीरथ,
कहाँ हो बाबा शिवशंकर?
डम-डम शिवशंकर,
माहमई गंगा,
योगरुपी शिवशंकर,
योगमई गंगा.
धीरे-धीरे,
चारो और,
फैल गयी काली जटाएं,
सोंख लिया,
एक-एक बूंद,
ना रहीं धाराएँ.
विलुप्त हो गयीं,
धरती पे आकर,
विष्णुप्रिया गंगा.
धिरधारी शिवशंकर,
प्रचंद्कारी गंगा,
सर्प्धारी शिवशंकर,
विनाशकारी गंगा.
चीत्कार उठे भागीरथ,
अब कहाँ से लाऊं गंगा.
तो हंस कर बोले,
शिवशंकर,
लो प्रकट भयीं, परमित,
अब शिवमई गंगा,
ममतामई गंगा,
कल्याणकारी गंगा.