बटन टूट रहा है


वक्त कुछ ऐसे मुझ पे सितम कर रहा है,
की हर शख़्स मुझसे मुख मोड़ रहा है.
क्यों ना हो शहर में चर्चा तेरे हुस्न का?
हर रात जो तेरी चोली का बटन टूट रहा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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मेरा अहंकार


इसी दोस्ती का मुझे इंतज़ार था,
इसी दोस्ती से मुझे प्यार है.
हर समीकरण को बदला है मैंने,
यही तो मेरा अहंकार है.

यूँ ही नहीं मैं जलजला हूँ आँधियों का,
राहें बदलीं हैं तूफानों ने मेरे लिए.
अकेला ही सही मगर खड़ा हूँ मैं,
हिमालय को भी ये एहसास है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

घूँघट और बेड़ियाँ


ये तय है की,
नदियों पे बाँध बाँधा जाय.
मगर ये ठीक नहीं की,
उनकी चौहदी तय की जाय.

ये माना की घूँघट भाता है,
हुस्न के मुखड़े पे.
पर ये ठीक नहीं की,
इसे उसकी बेड़ियाँ बनायीं जाय.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कच्चे फलों का स्वाद


असर होता है तो असर होने दो,
नजर लड़ रही है तो लड़ने दो.
बेवफा ही सही,
शाखाओं पे मंजर आने दो.

माना की टूटेंगे,
फल पकने से पहले सड़ेंगें।
पर इन ओठों को,
कच्चे फलों का स्वाद लेने दो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

दिल्ली को कोहरे से बचाये; आखिर क्यों?


वो पीपल के झूलों पे दोपहर में झूलना,
वो नाँद पे बैलों का लड़ना,
वो ग्वालिनों का घूम – घूम के दही – दूध बेचना,
वो सर पे घाँस उठाये, बच्चों को कमर पे लिए,
एक समूह में गुनगुनाते औरतों का साँझ को लौटना।

वो सुबह पक्षियों का कलरव करना,
वो बतखों का आँगन ने मोहना तक जाना,
और शाम को लौटना,
वो सुबह अँधेरे में उठकर दूसरों के फूल चोराना,
अंधड़ में बगीचे में दूसरे के जाकर आम लूटना,
फिर उन आमों का आचार और अमावट डालना।

वो शादियों में एक आँगन में समूह का इकठ्ठा होना,
एक चूल्हे पे रात भर खाना बनना,
एक थाली में कइयों का खाना,
धान पे पुलाव पे ठंठ में सोना,
गर्मी में सतुआ, तीसी खाना,
मठ्ठा, माड़ और बेल का रास पीना।

वो धूल उड़ाती, धूल से सनी पगडंडिया,
उन पगडंडियों पे दौड़ना,
वो मेहमान को खेत और पोखर तक सुबह ले जाना,
वो शादी में कुंवारी लड़कियों को छेड़ना, टकराना,
वो भैया के ससुराल देवर का महीनो पड़े रहना।

वो सवर्णिम युग था गावों का भारत में,
जो कब का लूट गया, मिट गया, बर्बाद हो गया.
किसी ने कुछ नहीं किया, ना आवाज उठाई,
और आज चाहते है वो सभी की दिल्ली को कोहरे से बचाये।
आखिर क्यों?

 

परमीत सिंह धुरंधर

शिकायत


मुझे सरहदों से शिकायत नहीं है,
इस शहर को तो हवाओं ने लुटा है.
इसमें दोष मयखाने का नहीं है दोस्तों,
मुझे तो उनकी निगाहों ने पिलाया है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

वो यौवन जिसे चोली बाँध न सके


मैं शहर की दुकानों पे,
गावं के खिलोने ढूंढ रहा हूँ.
त्रिशंकु की स्थिति में फंसा मैं,
अपने लिए एक विश्वामित्र ढूंढ रहा हूँ.

अलौकिक – अद्भुत – सुंदर,
सुंदरियों के बीच में,
वो पनघट – कच्ची पंगडंडियों पे,
लचकती – लहराती -बलखाती,
कमर ढूंढ रहा हूँ.

नए युग की इन अप्सराओं के बीच,
वो चोली की डोर और घूँघट वाली,
शर्मीली – मासूम गोरी ढूंढ रहा हूँ.

इस मोबाईल – फ़ेकबुक – ट्विटर के जाल में,
वो पोस्टकार्ड, डाकिये की घंटी,
और एक अखबार का पेज ढूंढ रहा हूँ.

दौलत के पीछे तो मैं भी भाग रहा हूँ,
सफलता के लिए जीवन में,
ये हीं दब के, दुबक के बैठा हूँ.
पर सच में, मन से,
मैं इस भीड़ में हर सुबह – शाम और रात,
बस वो खेतों में घांस काटती ग्वालिन,
पोखर में कपडे धोती घोबन,
और खलिहान में धान पिटती,
बंजारन का यौवन ढूंढ रहा हूँ.

वो यौवन, जिसे चोली बाँध न सके,
वो यौवन, जिसे धूल – मिट्टी,
और धूप – ठण्ड कुम्हला न सके.
वो यौवन, जिसपे ठहर कर बूंदें मोती बन जाए,
वो यौवन, जिसे भूख – गरीबी,
बच्चों का स्तनपान भी मिटा न सके.
मैं उस प्राकिर्तिक – नैसर्गिक यौवन की,
एक झलक ढूंढ रहा हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर