फिराक हम हो गए


जवानी के दिन थे और कुर्बान हम हो गए
उसकी एक नजर के आगे फिराक हम हो गए.
वो खिलने लगी हर दिन दोपहर सा
और रातों को ना बुझने वाला चिराग हम हो गए.

कसने लगा था अंगों पे उसके वस्त्र
ठहरने लगा था पाने – जाने वालो का उसपे नजर.
किस्मत में जाने वो किसके थी
मगर कुछ दिनों के बादशाह हम हो गए.

Dedicated to Firaq Gorakhpuri……

परमीत सिंह धुरंधर

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आँखों से सलाम लीजिये


दर्द में हर दिल का पैगाम लीजिये
मुस्करा कर ना सही
फिर भी आँखों से सलाम लीजिये।

मिल गए है कई साथी नए राहों में
पर पुराने खिदमतगारों का अपने
नजरें – करम लीजिये।

माना की पर्दा जरुरी है
पुराने दरकते दीवारों पे
मगर कभी तो
इन चारदीवारों में भी बैठ लीजिये।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं प्रतिव्रता नहीं हूँ


मैं हूँ एक भारतीय नारी
संस्कारों से भरी
काजल लगाती हूँ आँखों में
और करवा चौथ का व्रत भी रखती हूँ
पर मैं प्रतिव्रता नहीं हूँ
मैं पतिव्रता तो नहीं हूँ.

पूजती हूँ पति को
अपने परमेश्वर मान कर
उनकी एक खांसी पे जगती हूँ रात भर
लम्बी उम्र को उनके
उपवास भी रखती हूँ
पर मैं प्रतिव्रता नहीं हूँ
मैं पतिव्रता तो नहीं हूँ.

हसने – खेलने की कोई
उम्र नहीं होती
जवानी में ही सिर्फ
अंगराई – अटखेली नहीं होती
सांझ ढले उनकी नींदे गहरी हो जाती हैं
लेकिन मैं अब भी चाँद बनकर
बादलों में छूप जाती हूँ.
पर मैं प्रतिव्रता नहीं हूँ
मैं पतिव्रता तो नहीं हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

मोदी :अविश्वास प्रस्ताव-2018 (part 2)


माँ
जमाना देखेगा
मेरे रंग को
जब मैं रंग दूंगा
तेरे आँचल को.

अभी तो बहुत पड़ाव
आने बाकी हैं
जहाँ पड़ेंगीं मुझको गालियाँ।
मगर हर पड़ाव पे
जमाना झुकेगा
तेरे चरणों में.

उन्हें धीरज इतना भी नहीं
की मेरे जाने का इंतज़ार कर लें.
वो जिन्हे सिर्फ सोने -जवाहरात
लगाने का शौक है अपने तन से.
वो मुझे गले लगाएं या ना लगाएं
उन्हें एक दिन लगाना होगा
तेरी माटी को अपने तन – मन से.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मोदी :अविश्वास प्रस्ताव-2018


जो धरा को अब भी अपना धरोहर हमझते हैं
वो जान लें की अब सत्ता पे मोदी बैठें है.
आसान नहीं है उन्हें उठा देना
वो जो आसान पे सम्पूर्ण तपो बल से बैठें हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी


रंग जिंदगी में कुछ भी हो
तन्हाई का न हो.
तकलीफ जिंदगी में कुछ भी
बेवफाई का ना हो.

महफ़िल में कोई आये मेरे या ना आये
इंकार तुमसे ना हो.
गले से मेरे कोई लगे या ना लगे
शिकवा तुमसे ना हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तनी देखि ना पतरा पंडित जी


बड़ी भारी भइल बा जोवन
कर अ ता बड़ी जुलम।
तनी देखि ना पतरा पंडित जी
कहिया लागि लगन?

चढ़ल जाता इ उम्र
सूना – सूना जाता हर सावन।
तनी देखि ना पतरा पंडित जी
कहिया लागि लगन?

सारी सखियाँ भइली लरकोरी
झुल अ तारी भरके गोदी
ललचे रहल – रहल हमरो मन.
तनी देखि ना पतरा पंडित जी
कहिया लागि लगन?

 

परमीत सिंह धुरंधर