उम्र भर का है दुश्मन


मेरे दिल की दुनिया में एक सूना सा आँगन है,
जिसकी दीवारों पे कुछ भी नहीं है अपना।

ख़्वाबों को क्या देखें? जिसे दोस्त समझा,
वो ही उम्र भर का है दुश्मन अपना।

उमरते हैं बादल, घने – काले बरसने को,
पर उसके छत्ते पे आके रंग बदल लेते हैं अपना।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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फगुआ के मज़ा लूटह


जीयह हो Crassa भाई जीयह,
फगुआ के मज़ा लूटाह।
सब कोई पीये ताड़ी लोटा से,
तू चोलिये से ताड़ी पीयह।

जीयह हो Crassa भाई जीयह,
फगुआ के मज़ा लूटाह।
सब कोई पीये ओठवा से,
तू अंग-अंग से पीयह।

जीयह हो Crassa भाई जीयह,
फगुआ के मज़ा लूटाह।
सब कोई तोड़े पलंग,
तू देवाल के ही ढाहह।

 

परमीत सिंह धुरंधर

बलिदान हो – बलिदान हो – 3


वक्त की पुकार पे,
रक्त का दान हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

है अगर भय तुम्हे,
तो खुद से ही आज पूछ लो.
क्या है वो जिंदगी जिसके?
बेड़ियों में पाँव हों.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

जो रुक जाये वो धारा नहीं,
जो डूब जाए वो किनारा नहीं।
मानव हो तुम कोई पशु नहीं,
जो दर पे किसी के बंध जाए.
वो पौरष नहीं जिसका,
ना स्तुति, ना कोई गान हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

जो भूल गए इतिहास अपना,
उनका कोई वर्तमान नहीं।
वो क्या मांगेंगे हक़ अपना जालिम से?
जिनको अपने लहू का आभास नहीं।
ये समर है उन वीरों का जिनका,
प्राण से बढ़कर मान हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शयनकक्ष के झरोखे से : भाग – 3 (दोस्त, उसकी पत्नी और आँखों पे पट्टी)


अंकुर: “भाई, कैसे तुम भाभी के साथ निभा पा रहे हो. मैं तो बोर हो गया हूँ और मेरी बीबी हर समय मुझसे लड़ती रहती है की अब मैं पहले सा नहीं हूँ. उसे प्यार नहीं करता हूँ.”
मैं: “अरे भाई, इसमें इतना चिंता की बात नहीं है. उन्हें हर पल रोमांटिक पल चाहिए, बस दे दिया करो.”
अंकुर: “वो ही तो कहाँ से लाऊँ? घर जाते ही वो मुझे कुछ नहीं करने देती और अपने बातों का पूरा बण्डल ले कर बैठ जाती है.”

फिर मैंने अंकुर को बताया की मैं घर जाते ही रश्मि की आँखों पे पट्टी बाँध के कही बैठा देता हूँ. उसके बाद अपने सारे काम ख़तम कर उसकी पट्टी खोलता हूँ. वो एक दम खुश हो जाती है और कहती है “How Roamntic!”

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कुछ दिन बाद अंकुर फिर मिला, मिलते ही बोला, “भाई सब गड़बड़ हो गया है.”
अंकुर:”मैंने बस एक दिन उसकी आँखों पे पट्टी बाँधा, उसके बाद से मैं जैसे ही घर जाता हूँ, वो ही मेरे आँखों में पट्टी बाँध के जाने घंटों – घंटों क्या करती है?”
मैं:”तो इसमें क्या दिक्कत है? मज़ा तो ले रहे हो ना तुम.”
अंकुर:”अरे नहीं भाई. पहले तो मुझे किसी के मेरे घर में चलने – होने का आभास होता था. अब तो मुझे ऐसा लगता है की कोई रात में मेरे घर में रहता भी है. वो पिछले छह महीने से मेरी आँखों की पट्टी अब वो सुबह में खोलती है.”
मैंने हँसते हुए कहा की भाई तो तुम खुद ही पट्टी खोल लो और देख लो कोई है की नहीं घर में. मैं नहीं समझ पा रहा हूँ की तुम सुबह तक इंतज़ार क्यों करते हो.
अंकुर:”अरे वो मेरा हाथ – पैर सब बाँध देती है और बिस्तर पे डाल देती है. फिर मुझे छोड़ कर कही चली जाती है और सुबह में मेरी पट्टी खोलती है.”

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

शयनकक्ष के झरोखे से : भाग – 2 (पत्नी और उसकी बिछड़ी बहन)


रश्मि, “क्या जी आज कल किसके साथ लगे रहते हो फ़ोन पे. घर पे कोई तुम्हारे साथ है, उसपे भी कोई ध्यान दे दो.”
मैं, “अरे ध्यान तो तुम ही नहीं देती। जैसे भी रात होती हो, तुम तो अपने दर्पण की बाहों में चली जाती हो.”
रश्मि,”सुनो, मैं सही में पूछ रही हूँ. कौन है, किसके साथ तुम ये बात करते हो? मैं अपने जीवन में कोई और किस्सा नहीं चाहती।”
मैं, “हंस कर अरे तुम भी ना. अरे ये कोई नहीं, सुजाता है.”
रश्मि ने पहली बार दर्पण को छोड़कर, मेरी तरफ मुड़कर अपनी दोनों आँखों से सीधे – सीधे देखते हुए पूछा की ये सुजाता कौन है, और मैं कब मिला।
मैं भी अचंभित की क्या हो गया इसको।
मैंने पता नहीं क्यों बिना मज़ाक किये या बात को बढ़ाये ही उसे बताना उचित समझा की सुजाता कौन है. शायद एक साल के साथ के बाद हर पति समझ जाता है की पत्नी को ना छेड़ा जा सकता है न ही उससे मज़ाक किया जा सकता है. तभी तो घर के बाहर कोई चाहिए एकांत में छेड़खानी के लिए. शादी के बाद के अवैध संबंधों का ये ही कारण है.
मैंने कहा, “अरे तुम्हारी छोटी बहन, मेरी साली सुजाता।”
दो मिनट की मौन के बाद सायद उसे एहसास हो गया की मैं क्या सोच रहा हूँ.
उसने कहा, “अरे तो सीधे बोलो न की मेरी बहन से बात करते हो. यहाँ तो हर गली – गली में कितनी सुजाता होंगी। और इतना क्या रोज – रोज मेरी बहन से बात करोगे, की मैं समझ जाऊं। मुझे तो अभी भी शक है और सुजाता ने मुझे तो तभी तुम्हारी कोई कही बात नहीं बोली की मैं शक ना करूँ।”

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रश्मि, “सुनो, आज तुम्हारी सुजाता से बात हुई थी या आज कल बंद है.”
मैंने, “हुई थी बाबा, वो रोज मुझे दफ्तर में भी कॉल कर देती है, अगर मोबाईल पे रिप्लाई न दूँ.”
रश्मि, “लेकिन आज मुझे दो घंटे बात हुई. मैंने कितनी बार तुम्हारा नाम लिया। कितना उससे पूछा, कितना तुम्हारे बारे में मैं बोली। उसने तो कुछ भी नहीं कहा.
मैं, “अरे मुझे क्या पता, तुम बहनों में क्या है?”
रश्मि, “मुझे अपना फ़ोन दो और उसका नंबर दिखावो, मुझे पूरा यकीन हैं ये सुजाता शायद मेरे कुम्भ के मेले में बिछड़ी बहन है. मुझे भी अब उससे मिलना है.”
मैंने पुरे आत्मविश्वास के साथ सर झुका कर फ़ोन उसको सौंप दिया।
पूरी जॉंच – पड़ताल के बाद फ़ोन मुझे सौंपते हुए रश्मि बोली, “चाय पीनी है.”
मेरे कुछ बोलने से पहले ही वो रसोई की तरफ जाती बोली, “पकोड़े भी बना देती हूँ, बहार ठण्ड हैं.”

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

Crassa के शयनकक्ष के झरोखे से : भाग – प्रथम


मैं बिस्तर पे बैठे कुछ पढ़ रहा था. तभी दरवाजा खोलते ही रश्मि दरवाजे पे ही ठिठक गयी. चौंकते हुए, आवाज में खीज की खरास रख कर वो बोली, “अरे ८ बजे ही चढ़ गए.”
मैंने देखते हुए उसे कहा, ” हाँ मुझे बहुत नींद आ रही है. तुम भी आ जाओ, जल्दी सोते हैं.”
रश्मि, “सब जानती हूँ मैं तुम्हारी नींद को. ३ बजे तक ना सोओगे खुद, ना सोने दोगे किसी को. हर रोज का एक ही आदत है. मैं नहीं आउंगी, बहुत काम है मुझे।”

उसके बाद रश्मि दर्पण के सामने बैठ के श्रृंगार करने लगी. मुझे पता है अब वो दो – तीन घंटे तक नहीं उठने वाली। पर ये नहीं समझ पाया की ये रात में श्रृंगार करती क्यों है? बाकी सारी औरत जन दिन में करती है, कहीं जाने पे करती हैं. आखिर धीरज खोकर मैंने आज पूछ ही लिया, ” ये तुम रोज रात में इतना सजती – सवरती क्यों हो, किसके लिए? बाकी लोग तो दिन में बाहर जाने पे श्रृंगार करती हैं.”
रश्मि,”ओह्ह्ह हो, तो अब दूसरे का श्रृंगार देखा जा रहा है की कौन कब सज रहा है? मैं तुम्हारी तरह नहीं हूँ जो दुसरो को देखूं और दिखाऊं।”
मैं, “अरे मैं तो बस ये नहीं समझ पता हूँ की तुम यहाँ बैठ के बिस्तर पे श्रृंगार क्यों नहीं करती। और ये मैं बुला रहा हूँ तो भी अब चार – चार घंटे तुम पता नहीं क्या करती हो? मुझे नींद आ रही है. सो जाऊँगा फिर.”
रश्मि, “सो जावों, मुझे बहुत काम हैं.”
आखिर मैं सो गया और पता नहीं रश्मि कब आकर लेट गयी.

अगले दिन, मैंने शाम को दोस्तों के साथ कुछ प्रोग्राम बनाया। जैसे ही आज जल्दी निकला ऑफिस से, तीन बजे, ताकि दोस्तों को सहूलियत रहे उनके घर जाने में भी, वैसे ही रश्मि का फ़ोन आ गया.
मैं, “हाँ, बोलो।”
रश्मि, “अरे तबियत तो ठीक है.” मैंने कहा की हाँ ठीक हूँ, मुझे क्या हुआ?
रश्मि,”तो ऐसे क्यों बोल रहे हो? नींद पूरी हई थी न तुम्हारी रात को.”
मैं, “हाँ मैं तो ११ बजे सो गया था. फिर क्यों पूरी नहीं होगी?”
थोड़ी देर शांत रहकर उसने कहा की अच्छा आज जल्दी घर आ जावों। मैंने कहा की मैं जल्दी आकर क्या करूँगा? मैंने उसे बोला की आज दोस्तों के साथ प्रोग्राम बन गया है, इसलिए मैं उनसे मिलने जा रहा हूँ.
मैं, “और वैसे भी तुम को बहुत काम रहता है. सो तुम उन्हें निपटा लो, तब तक मैं आ जाऊँगा।”
रश्मि, “अरे, मैंने आज सब काम जल्दी ख़तम कर दिया है. सोचा, तुम रोज कह रहे हो, तो आज तुमसे बाते करुँगी और जल्दी सो जाउंगी। वैसे भी तुम्हारे चलते रोज सो नहीं पाती।”
मैं, “मेरे चलते या तुम खुद ही लेट से सोती हो.”
रश्मि,”अरे तो कोई क्या करे? तुम्हारी तरह बिस्तर पे शाम से ही कब्जा कर लूँ और लड़ूँ तुमसे।”

रश्मि,”देखो मैंने, खाना बना दिया है आज तुम्हारे लिए. जल्दी – जल्दी किया, मेरा पूरा शरीर दुःख रहा है. ताकत नहीं है की रात भर बैठ कर तुम्हारा इंतज़ार करू। मैंने सब काम करने के चक्कर में आज दोपहर का खाना भी नहीं खाया की एकसाथ अब रात को तुम्हारे साथ ही खा लुंगी।”
रश्मि,”लेकिन तुम्हे ना मेरा ख्याल है ना प्यार। चलो, दोस्तों के साथ मजे करों, यहाँ बीबी मरे तो मरे. हाँ और सुनो, आज रात उन्ही के साथ रुक जाना, या होटल में सो जाना।”

आश्चर्य में पड़ते हुए, मैंने पूछा ये क्यों?
रश्मि, “अरे बोली तो, आज पूरा शरीर टूट रहा है. लगता है की नींद नहीं टूटेगी, इतनी थकी हूँ की, और मैं दरवाजा नहीं खोल पाउंगी। तुम्हारे लिए बोल रहीं हूँ की ताकि तुम्हे रात में दिक्कत ना हो बाहर खड़े रहने में.”
रश्मि,”कोई अपने यार को नहीं बुलाया है तुम्हारी तरह, जो तुम्हे घर आने से मना कर रही हूँ.”
और ये कहते ही फ़ोन रख दिया उसने। पांच मिनट सोच के मैंने दोस्तों को सूचित किया रश्मि की तबियत बिगड़ गयी है. मैंने उनसे माफ़ी मांगी ये कह कर की मुझे उसे डॉक्टर के पास ले के जाना है.
वापस घर जाने के लिए निकल पड़ा. मुझे पता है आज बिस्तर पे ५ बजे से बैठना पड़ेगा और उसका श्रृंगार आज ५ बजे से ही शुरू हो जाएगा।

मन मेरा ये ही सोच रहा था की जाने कैसे इस औरत को हर बार पता चल जाता है की मैंने कोई और प्रोग्राम बनाया था और बहार जा रहा हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर