फिराक हम हो गए


जवानी के दिन थे और कुर्बान हम हो गए
उसकी एक नजर के आगे फिराक हम हो गए.
वो खिलने लगी हर दिन दोपहर सा
और रातों को ना बुझने वाला चिराग हम हो गए.

कसने लगा था अंगों पे उसके वस्त्र
ठहरने लगा था पाने – जाने वालो का उसपे नजर.
किस्मत में जाने वो किसके थी
मगर कुछ दिनों के बादशाह हम हो गए.

Dedicated to Firaq Gorakhpuri……

परमीत सिंह धुरंधर

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फ्रांस जीत ले गइल विश्व ख़िताबवा


चोलिया के हमारा
मसकअता सियनवा।
बलम, गवनवा करा द ना.
कहियो लूट जाइ सारा जोवनवा
बलम, गवनवा करा द ना.

सबके लागल बा हमपे नयनवा
बलम, गवनवा करा द ना.
कहियो टूट जाइ धीर के बाँधवा
बलम, गवनवा करा द ना.
मुखिया चाहअता हमसे मिलनवा
बलम, गवनवा करा द ना.

भइल मुश्किल बा खेळल अब फगुआ
बलम, गवनवा करा द ना.
जवार सारा, चाहे पकड़े के कलइया
बलम, गवनवा करा द ना.
कहियो टूट जाइ ना त हमरो चारपाइयाँ
बलम, गवनवा करा द ना.

फ्रांस जीत ले गइल विश्व ख़िताबवा
बलम, गवनवा करा द ना.
हेमा ले अइली जीत के सोना के मेडलवा
बलम, गवनवा करा द ना.
कहियो टूट जाइ हमरो नथुनिया
बलम, गवनवा करा द ना.

परमीत सिंह धुरंधर

वक्षों पे कुरुक्षेत्र


विशाल वक्षों पे
प्रहार करो, वत्स।
ये करुक्षेत्र है तुम्हारा
अब शंखनाद करो, वत्स।

क्या है यहाँ तुम्हारा?
क्या है पराया?
मोह का त्याग कर
परमार्थ करो, वत्स।
विशाल वक्षों पे
प्रहार करो, वत्स।

जो आज है
वो कल मिट जाएगा।
कल जो आएगा
वो तुम्हे मिटा के जाएगा।
अतः कल के फल की चिंता
किये बगैर तीरों का संधान करो, वत्स।
विशाल वक्षों पे
प्रहार करो, वत्स।

नस – नस में उनके एक अग्नि
सी जल जाए.
ह्रदय में उनके पुनः मिलन
की आस रह जाए.
शिव सा कालजयी होकर
काम का संहार करो, वत्स।
विशाल वक्षों पे
प्रहार करो, वत्स।

अद्भुत दृश्य होगा
रक्तरंजित कुरुक्षेत्र होगा।
धरती से आकाश तक
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड गवाह होगा।
हो एक – एक इंच उनका
तुम्हारी गिरफ्त में.
पाने शौर्य का ऐसे विस्तार करो, वत्स।
विशाल वक्षों पे
प्रहार करो, वत्स।

कब सृष्टि रुकी है?
किसी के लिए.
कब वक्त को किसी ने
बाँध लिया है खुद के लिए?
तुम नहीं तो कोई और
बनाएगा उन्हें अपना, जीत कर.
तुम बस एक साधन हो
इस लक्ष्य प्राप्ति का.
प्राप्त मौके को गवा कर
जीवन को ना बेकार करो, वत्स।
विशाल वक्षों पे
प्रहार करो, वत्स।

परमीत सिंह धुरंधर

विशाल वक्षो पे प्रहार करो, वत्स


विशाल वक्षो पे
प्रहार करो, वत्स।

नयनों को लड़ाते
अधरों को चूमते
ग्रीवा से होकर
अपने गर्व का
वक्षों पे हुँकार भरो, वत्स।
विशाल वक्षो पे
प्रहार करो, वत्स।

ये चाँद भी तुम्हारा
ये निशा भी तुम्हारी।
उषा के आगमन तक
तनिक भी न
विश्राम करो, वत्स।
विशाल वक्षो पे
प्रहार करो, वत्स।

ये वक्त भी तुम्हारा,
ये पथ भी तुम्हारा।
उनके शर्म को
उन्ही की वेणी से बांधकर
उन्ही के वक्षों पे
संहार करो, वत्स।
विशाल वक्षो पे
प्रहार करो, वत्स।

ना भय में बंधो
ना भविष्य की सोचो
की वो वफ़ा करेगी
या बेवफा निकलेगी।
बस अपने कर्म पथ पर
अडिग हो कर
उनके नस – नस में उन्माद भरो, वत्स।
विशाल वक्षों पे
प्रहार करो, वत्स।

उनके उमरते-मचलते
विलखते-पिघलते
कसमसाते विशाल देह को
अपने प्रचंड, बलिष्ठ
भुजाओं में दबोच कर
अनंत समय तक
प्यार करो, वत्स।
विशाल वक्षो पे
प्रहार करो, वत्स।

 

परमीत सिंह धुरंधर

वो शिव है


अनंत है जो
वो शिव है.
विराज है कैलाश पे
पर समस्त ब्रह्माण्ड
अधीन है.
सर्वस्व का त्याग कर
सर्वस्व का स्वामी है.

योगी है, वैरागी है
भूत-भभूत, भुजंगधारी है.
गरल को तरल कर दे
सरल-ह्रदय, प्रचंडकारी है.
सर्वस्व का त्याग कर
सर्वस्व का स्वामी है.

काल को स्थिर करे
प्रचंड को सूक्ष्म करे.
नग्न-धरंग, अवघड़-अलमस्त
जटाधारी है.
सर्वस्व का त्याग कर
सर्वस्व का स्वामी है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं हो गयी विशाल


तेरे अंग – अंग से लग के,
मैं हो गयी विशाल।
थोड़ा काटों धीरे – धीरे राजा,
अभी हूँ मैं नै एक कचनार।

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न की नियत


तेरी – मेरी चाहत जरुरी है,
कुछ साँसों की गर्मी है,
और कुछ मज़बूरी है.

जब भी मिलती है तू,
सरक जाता है तेरा आँचल।
कुछ हवाओं का जोर है,
और कुछ तेरी जवानी है.

तेरी हर निगाह, एक क़यामत है,
कोई माने या ना माने, मैं मानता हूँ.
पर तू बनेगी किसी और की ही,
कुछ हुस्न की नियत,
और कुछ मेरी बेबसी है.

 

परमीत सिंह धुरंधर