14 फरवरी (#ValentinesDay)


नवम्बर का महीना था,
दिसंबर का इंतज़ार था,
वो बोलीं,
जनवरी में मेरी हो जायेंगीं।

एक चिठ्ठी पहुँची,
फरवरी में घर मेरे,
की 14 को,
वो किसी और की हो जायेंगीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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वो (#PriyaaVarrier) अभी – अभी जवान हुई हैं


किताबे खुली रखो,
दिल को बाँध के रखो,
वो अभी – अभी जवान हुई हैं,
उनसे बस रातों का रिस्ता रखो.

वो जितना चाहें,
गीत गाती रहें वफ़ा के.
तुम उनसे अभी,
ना इसकी उम्मीदें रखो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तुम्हारा नाम है बरखा


तुम्हारा नाम है बरखा,
मेरा काम है बरसना।
तू 46 में भी ऐसी,
की दिल चाहता है,
तेरे संग बहकना।

मौसम,
तेरे मुस्कुराने से बदलता है,
दिल राइट विंग से,
लेफ्ट विंग में धड़कने लगता है.
तेरा अंदाज है कातिलाना,
मेरा शौक है आजमाना।
तू ४६ में भी ऐसी,
की दिल चाहता है,
तेरे संग बहकना।

तुम्हारा नाम है बरखा,
मेरा नाम है Crassa।
तू ४६ में भी ऐसी,
की दिल चाहता है,
तेरे संग बहकना।

 

परमीत सिंह धुरंधर

फगुआ के मज़ा लूटह


जीयह हो Crassa भाई जीयह,
फगुआ के मज़ा लूटाह।
सब कोई पीये ताड़ी लोटा से,
तू चोलिये से ताड़ी पीयह।

जीयह हो Crassa भाई जीयह,
फगुआ के मज़ा लूटाह।
सब कोई पीये ओठवा से,
तू अंग-अंग से पीयह।

जीयह हो Crassa भाई जीयह,
फगुआ के मज़ा लूटाह।
सब कोई तोड़े पलंग,
तू देवाल के ही ढाहह।

 

परमीत सिंह धुरंधर

वक्षों से संग्राम ना हो


वो वक्ष नहीं,
जो विशाल ना हो.
अनंत तक जिसका,
विस्तार ना हो.
जिसपे क्राससा जैसा भ्रमर,
नितदिन करता रसपान ना हो,
विश्राम ना हो.

ग्रीष्म क्या, शरद ऋतू क्या?
वो वक्ष नहीं,
जिसपे हर क्षण विकसित,
कोई वसंत ना हो.
वो यौवन क्या?
जिसको अपने वक्षों पे गुमान ना हो.
और वो वीर ही क्या?
जिसके जीवन में वक्षों से संग्राम ना हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जब तक ना उतरेगी मेनका


सारा – शहर है मेरी नजर पे फ़िदा,
तुम कैसे बचोगे, कब तक ?
विश्वामित्र का वंशज हूँ,
ना पिघलूंगा, जब तक ना उतरेगी मेनका।

पत्थर बनके कहीं मिट ना जाओ,
चख लो समंदर का अमृत ज़रा.
विश्वामित्र का वंशज हूँ,
रचूंगा नया सवर्ग अपना।

ढल जाएगा यौवन, तो हाथ मलना पडेगा,
देख – देख के छलकता गागार यहाँ।
विश्वामित्र का वंशज हूँ,
अनंत तक चमकूंगा बांके सितारा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

वक्ष अध्यात्म का प्रथम और आखिरी पाठ हैं


वक्षों पे ही मोक्ष है,
जो प्राप्त कर ले इन्हे,
वो ही वशिष्ठ और अगस्त्य है.
यूँ ही भीष्म ने नहीं रोक लिया था,
अपने तीरों को,
जो वीर हैं, वो उठाते नहीं,
इनपे तीर और तलवार हैं.

जलवाई को नियंत्रित करते,
इस भीषण – प्रचंड शीतलहर में,
ये ही हैं जो धमनियों को निरंतर,
रखते हैं जागृत और उनमे,
रक्त को करते संचारित।
कामुकता नहीं, अध्यात्म का,
बस यही प्रथम और आखिरी पाठ हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर