बेआबरू


जो हमें हमारी आरजू दे गए
कसम से बड़े बेआबरू कर गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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खुदा कहाँ है?


सब चाहते हैं जानना की खुदा कहाँ है?
जन्नत कहाँ है?
माँ जिधर कदम रख दे
उससे हसीन भला और क्या है?

 

परमीत सिंह धुरंधर

पतली कमर का सिहरना हुआ – 2


शर्म – लज्जा वस् मैं तट पे ही रही
उसका निर्वस्त्र – मग्न
लहरों से खेलना, लहरों में तैरना हुआ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चुपके से पायजेब पहना दूँगा


दरिया में आगा लगा दूँगा
दर्पण में ख्वाब जगा दूँगा
ऐसी बाजीगरी के हुनर
रखता हूँ इन हाथों में
तू बस घूँघट तो उठा
मैं शर्म – हया सब चुरा लूँगा।

तितलियाँ चतुर हैं, चंचल हैं
उड़ जाती हैं दो पल बैठ के
मगर दो पल तो बैठे मेरे पास
चुपके से पावों में
पायजेब पहना दूँगा।

रहस्य से भरे हैं लोग यहाँ
एक मैं ही दिल का खुला हूँ
तू एक पल को तो
दिल लगा के देख
मैं सारी उम्र उसी पल में
गुजार दूँगा।

शहर भर से मत पूछा कर
मेरे अतीत के किस्से
तू श्री गणेशाय: तो कर
मैं धीरे – धीरे तुझे
सब सुना दूँगा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

गरीबी में भी गुरुर रखती हैं


वो अपनी बाहों में समंदर रखती हैं.
तभी तो इस गरीबी में भी गुरुर रखती हैं.

ना जिस्म पे सोने – चांदी के गहने
ना लाखों – हजारों का श्रृंगार ना कपड़े
मगर राजा, रंक सभी नज़ारे गराये हैं उसपे
जाने क्या?
मैंले – कुचले, फटे – चिथड़े
अपने दुप्पटे में वो रखती है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

धारा 497 (section 497 of IPC)


नशा पीने से हो या पिलाने से हो
नशा होना चाहिए।
दर्द सीने में हो या जीने में हो
दर्द होना चाहिए।
इश्क़ कुवारी से हो या विवाहित से हो
इश्क़ होना चाहिए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

दो पल


वो जो मुझे तन्हा कर गयी
अब अपनी तन्हाई का जिक्र करती हैं.

दो पल में ख़त्म हो जाते हैं उनके सारे किस्से
और मेरे संग के दो पल का घंटों जिक्र करती हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर