गरीबों की सुन ले ए दाता


गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।
जब जीना ये चाहते हैं,
साँसे टूट जाएँ,
जब पीना ये चाहते हैं,
दरिया सुख जाए.
इनके बस में कही कुछ भी ना,
एक तेरे नाम के सिवा।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।
भोले – भाले,
पल में छले जाते हैं,
बेबस, लाचार,
अपने शर्म से मर जाते हैं.
कोई दुआ नहीं, कोई दया नहीं,
जीवन में इनके,
बस तेरी एक आस के सिवा।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू है विधाता।

परमीत सिंह धुरंधर

पालनहार


माँ का कोई रूप नहीं,
माँ का कोई रंग नहीं.
माँ तो दिव्य है,
माँ साक्षात ब्रह्म है.
माँ ही ओमकार है,
माँ ही निराकार है.
धरती पर माँ,
भागवत का रूप साकार है.
विश्व का आधार,
धर्म का श्रृंगार,
माँ प्रेम का सास्वत,
भण्डार है.
संस्कृति माँ से, माँ ही ज्ञान,
स्वयं नतमष्तक है भगवान,
सृष्टि का माँ ही,
पालनहार है.

परमीत सिंह धुरंधर

वर


मुझे इतना ज्ञान तू दे पिता,
की भूखा भी मैं मुस्कराता रहूँ।
अन्धकार मिले मेरी आँखों को,
या तिरस्कार मिले इस जीवन को,
मैं हर पल तेरा नाम गाता रहूँ।
पतन भी हो जीवन का अगर,
मैं पाप कर्म भी करता रहूँ अगर.
मुझे इतना वर तू दे पिता,
मैं हर पल वेदो को पढ़ता रहूँ।

परमीत सिंह धुरंधर

परिन्दें


परिन्दें आसमा के,
धरती पे सिर्फ दाना,
चुगते हैं.
और हम धरतीवालों,
की किस्मत को देखो,
हम आसमा को छू कर भी,
प्यासे रहते हैं.
माँ को कुचल कर,
हम उस न दिखने वाले,
खुदा की दर पे,
सर झुकाते हैं.
जो बिना माँ के,
एक चीटीं भी नहीं गढ़,
पाते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर 

प्रभु हरि विष्णु


आप सा सरल कोई धर्म नहीं,
आप सा सबल कोई कर्म नहीं,
जो दौड़ती हैं आपकी नशों में,
मेरे मस्तिक में ओ ही प्राण दीजिये,
या प्रभु हरि विष्णु,
मुझपे भी थोड़ा धयान दीजिये।
ऐसा कोई पथ नहीं,
जो न मिले जाके आपके भवसागर में,
लक्ष्यहीन मेरे इस जीवन को,
मंजिल प्रदान कीजिये,
या प्रभु हरि विष्णु,
मुझपे भी थोड़ा धयान दीजिये।
सुगम नहीं है व्रत आपके नाम का,
पर ले लिया है प्रण,
अब चाहे तो मेरा बलिदान लीजिये,
या प्रभु हरि विष्णु,
मुझपे भी थोड़ा धयान दीजिये।
मुझसे भी कई हैं सबल यहाँ,
मुझसे भी कई है कर्मठ यहाँ,
भक्तों की भीड़ लगी है यहाँ,
सबसे पीछे खड़ा हूँ मैं निर्धन,
मौत से पहले मेरे जीवन को,
ऊंचाई का आसमान दीजिये,
या प्रभु हरि विष्णु,
मुझपे भी थोड़ा धयान दीजिये।

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

प्रभु विष्णु


ज्ञान दीजिये, अरमान दीजिये,
या फिर मुझको ये वरदान दीजिये,
वृक्षों से हरी कर दूँ सारी धरती,
या प्रभु मुझको दर्शन दीजिये – दर्शन दीजिये।
मान दीजिये, सम्मान दीजिये,
या फिर मुझको ये वरदान दीजिये,
हर रोते हुए को मैं दे दूँ हंसी,
या प्रभु विष्णु मुझ पे भी धयान दीजिये।

परमीत सिंह परवाज

हे प्रभु गणेश


हे प्रभु गणेश,
ज्ञान दो,
विज्ञान दो,
इन हाथों को,
कल्याण दो.
उद्धार हो मेरा,
प्रयास हो मेरा,
सफल सदा,
धुरंधर सिंह को,
ये वरदान दो.
हे प्रभु गणेश,
ये वरदान दो.