रातों में नेहरू बनना चाहते हैं


ज़माने को गुनाह करने दो-2,
हम इश्क़ करेंगे।
वो शांत हैं, शातिर हैं,
बच के निकल लेंगें।
सिरफिरों में मेरा नाम,
चलने दो.
भगत सिंह की इस धरती पे,
सब लंबा जीना चाहते हैं.
रातों में नेहरू और दिन में,
गांधी बनना चाहते हैं.
वो चालक हैं, चतुर हैं,
सत्ता हथिया लेंगें।
मुझे संघर्ष की राहों का,
लोहिया बनने दो.
लड़कियों का क्या है?
वो इन्हीं से प्रेम करेंगी,
कुवारीं इनके बच्चों की माँ बनेंगी,
और इनके आँगन में हिन् रोयेंगी।
वो कमजोर नहीं, पारंगत हैं,
इस शोषण के खेल में.
उन्हें ये खेल खेलने दो.
सत्ता के खिलाफ नव-विगुल,
बजाने वालों में मेरा नाम रहने दो.
ज़माने को गुनाह करने दो-2,
हम इश्क़ करेंगे।
वो शांत हैं, शातिर हैं,
बच के निकल लेंगें।
सिरफिरों में मेरा नाम,
चलने दो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

JNU और लोहियावादी मैं


मेरे वामपंथ (साम्यबाद) और JNU के वामपंथ में वो ही अंतर है जो गांधी और सुभास बोस में था और है.
वो जहाँ सशस्त्र क्रांति की मांग करते हैं, पूंजीवाद के खिलाफ, हर शोषण के खिलाफ। वहीँ जाने किस मज़बूरी में गांधी के अहिंषा परमो धर्म: में अपनी आस्था की दुहाई भी देते हैं। ये उनकी मज़बूरी है या दोहरापन, नहीं मालुम, लेकिन लोहियावादी कभी मजबूर नहीं होते। और ये दुर्भाग्य है की वामपंथ के गढ़ JNU ने ना राममनोहर लोहिया को अपनाया ना लोहियावादी मुझे।
परमीत सिंह धुरंधर