इश्क़ में ईद


इश्क़ में ईद हम भी मना ले,
कभी कोई चाँद तो निकले।
होली में रंग तो सभी,
खेल लेते है चेहरा छुपाके।
इश्क़ में दिवाली हम भी मना ले,
कोई एक दिया तो जलाये आँगन में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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कभी – कभी मेरे ह्रदय में बेदना उठती है


कभी – कभी मेरे ह्रदय में बेदना उठती है,
मैं सीमा का प्रहरी और तू आँगन की एक कलि है.
मैं अपने स्वार्थ वस बंधा हूँ तुझसे,
तू निस्वार्थ मन से मेरे संग कष्ट उठाती है.
कभी – कभी मेरे ह्रदय में बेदना उठती है.
तुमने काटी हस कर बरसों एक ही साड़ी में,
और लाने को नयी पोशाकें मेरे लिए,
होली में, मेरी हाथों को पैसे थमाती है.
मैं नहीं दे पाया तुम्हे कभी भो कोई खुशियाँ,
मगर तू जिन्दी के इस साँझ पे भी,
मेरी हर खुसी पे मुस्काती है.
कभी – कभी मेरे ह्रदय में बेदना उठती है,

परमीत सिंह धुरंधर

होली


एक होली मैंने खेली,
मेरी पिचकारी थी,
और थी उनकी चोली।
भींगती थी वो,
मुस्करा-मुस्कारा कर,
जब-जब हमने,
रंग थी उनपे डाली।

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

होली : मायका और ससुरा में


सोलहगो होली खेलनी मायका में,
मायका में,
पर अंग पे रंग चढ़ल ससुरा में.
पाहिले त आँखवा में आंसू आइल,
न अब माई-बहिनी भेटाई रे,
पर रोम-रोम पुलकित हो गइल,
जब नंदी मरलख पिचकारी से.
पिचकारी से.
गावं-गावं होली खेलनी मायका में,
मायका में,
पर अंग पे रंग चढ़ल ससुरा में.
दोपहर भइल फिर साँझ भइल,
सुने न कोई हमर गारी रे,
अरे चूड़ी टुटल, कंगन टुटल,
जब धइलख देवर अँकवारी में.
नाच-नाच होली खेलनी मायका में,
मायका में,
पर अंग पे रंग चढ़ल ससुरा में, परमीत

होली और सौतन


जब निकलती हूँ मै डाल के,
घूँघट अपने मुखड़े पे,
तो छुप जाता है सूरज,
जाने-जाके किन गलियों में.
जब चलती हूँ उठा के,
घूँघट मैं अपने मुखड़े से ,
तो चाँद भी बहक जाता है,
मेरे यौवन के रस से.
कैसी जवानी,
रब्बा तुने है दी मेरे तन पे,
हर गली में एक आशिक हैं मेरा,
हर घर में है एक सौतन रे.
कैसे छोड़ दूँ मैं,
साजन को अकेले होली में,
कितनो कि नजर मुझपे है,
और कितनो कि मेरे घर पे, परमीत

होलिका-दहन


रंगे-मोहब्बत चमक उठती है,
आज भी,
उनके एक नज़र मिलाने से,
दर्दे-जिगर को,
क्या समझाउं परमित,
जो आज भी बहल जाता है,
उनके सिर्फ मुस्कराने से.
वो खेल जाती हैं होली,
आज भी,
मेरी तमन्नावों से,
एक कसक सी उठती है,
जब फरेबे-मोहब्बत की,
जो उनके सिने में.
की जाने कब तक लुटता रहेगा,
यूँ ही मेरा आसियाना,
हर साल आ जातीं है वो,
होलिका-दहन मानाने,
मेरे ही आँगन में.