वो जिस्म में एक दिल रखते हैं


मेरे बैलों के दो सींग हैं
जिसपे वो मेरे आन – शान
को धारण करते हैं.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

कड़ाके की सर्दी हो
या भीषण गर्मी
बहते हैं दोनों झूम-झूम के.
मेरे तपते पीठ और ठिठुरते जिस्म
की खबर रखते है.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

मेरे बच्चों की भूख
मेरे परिवार के भविष्य
का ख्याल रखते हैं.
मेरे बैलों के दो सींग हैं
जिसपे वो मेरे आन – शान
को धारण करते हैं.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

जब तक ना बांध दूँ
दोनों को नाद पे
पहला खाता नहीं है.
और बाँधने के बाद दूसरा
पहले को खाने नहीं देता है.
नित – निरंतर, नाद पे, खूंटे पे
खेत में, बथान में
अपने सींगों को उछाल – उछाल
वो प्रेम की नयी परिभाषा रचते है.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

खाते हैं घास – फुस
इठला कर, उमंग से
पर नाद में सने नाकों से
घर के पकवानों पे नजर रखते हैं.
अपने हाथों से गृहलक्ष्मी जो ना
उन्हें भोग लगाए
तो फिर नए पकवानो के तलने
और भोग तक उपवास करते हैं.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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कहिया थ्रेसर से दवनी होइ?


हमारा जोबनवा के गईंठी ए राजा,
तहरा बथनियाँ में कहिया जली?
मन भर के चिपरी पथा गइल बा,
रउरा आलाउवा में कहिया जली.
अंग – अंग हमार गेहूं के बाली भइल बा,
कहिया थ्रेसर से दवनी होइ?
गन्ना, सरसों से भड़ गइल खलिहान,
अब महुआ के रस, राजा कहिया चली?
हमारा जोबनवा के गईंठी ए राजा,
तहरा बथनियाँ में कहिया जली?

अंखिया भी देखअ सुरमई बहिल बा,
केशिया में सावन गदराइल लागल बा.
अंखिया के हमारा तीर ए राजा,
तरकश पे रउरा कहिया चढ़ी?
गजरा के हमार फूल ए राजा,
खटिया पे रउरा कहिया टूटी?
हमारा जोबनवा के गईंठी ए राजा,
तहरा बथनियाँ में कहिया जली?

 

परमीत सिंह धुरंधर

कलम भी मौन रह गए


किसानों की ऐसी – की – तैसी करके,
गांधी की पार्टी चल रही है मुस्करा के.
झंडा उठा दिया है सत्ता के खिलाफ,
बस बीफ के मुद्दे को मुद्दा बना के.
दलितों के कपड़े फाड़ कर उनको,
नंगा कर दिया पुलिश वालो ने.
मोदी के मौन के खिलाफ,
साहित्य अकादमी आवार्ड लौटाने वाले,
कलम भी मौन रह गए,
हरिजनों के इस दमन पे.

परमीत सिंह धुरंधर