विषधर और स्तन-प्रेम


भैंसे,
दौड़ती हुई,
आनंद देतीं हैं.
खुरों से रोंद्ती,
उड़ाती हुई,
धूलों को.
अपने सींगों पे,
उछलती,
हवाओं के दम्भ को.
योवन से भरपूर,
उन्नत अपने स्तनों से,
विषधर को भी,
पागल कर देतीं हैं.
भैंसे,
दौड़ती हुई,
आनंद देतीं हैं.
काली हैं,
पर मतवाली हैं.
घंटों, तालाब में बैठी,
पगुराती हैं.
हरी – हरी दूबों को,
चरती, लहराती,
दो नयनों से अपने,
उपवन को मधुवन,
बना देती हैं.
भैंसे,
दौड़ती हुई,
आनंद देतीं हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

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जवान भैसें


काली-काली मेरी भैसें,
हैं इतना जवान।
छोड़ दूँ तो लूट लेंगी,
रात भर में गावं।
खूब खिलता हूँ,
तेल पिलाता हूँ।
रखता हूँ इनका,
कितना धयान।
काली-काली मेरी भैसें,
हैं इतना जवान।
सारे हैं दीवाने मेरी भैस के,
पंच, प्रमुख से पहलवान।
सभी है इसकी आँखों के कायल,
दोस्त, दुश्मन से अनजान।
काली-काली मेरी भैसें,
हैं इतना जवान।

परमीत सिंह धुरंधर