दुल्हन और दहेज़


दुल्हन ने जो घूँघट उठाई,
हर बाराती बहक गया.
मगर दूल्हा,
एक दहेज़ के लिए,
उस दुल्हन को छोड़ लौट गया.
मैंने तो हाथ बढ़ाया,
उसी मंडप में उसे थाम लेने को.
मगर मेरी मुफलिसी और ये गरीबी,
उस दुल्हन ने भी अपना मुख मोड़ लिया.

परमीत सिंह धुरंधर

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