दिवाली और दाल


कलेजा चीर देहलू तू ऐसे मुस्का के,
अब धोती मत फाड़ दअ, देह – से देह लगाके।
सारा थाती चल गइल,
ई दाल 250 रुपया किलो खरीदे में,
अब साड़ी मत मांगे लगियह,
करवा – चौथ आ दिवाली तू बता के.

परमीत सिंह धुरंधर

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दिवाली


वो दिवाली भी अकेली थी,
ये दिवाली भी अकेली गुजरी है.
तुम न होती जो ज्वाला गुट्टा,
तो जिंदगी की हर दिवाली अधूरी है.

परमीत सिंह धुरंधर

मज़ा


रौशनी में दिवाली तो हर कोई मनाता हैं,
अंधेरों में दिया जलाना हमें आता है.
अपनी किस्मत पे गुमान करने वालो,
किस्मत के साथ जुआ खेलने का मज़ा हमें आता हैं.

परमीत सिंह धुरंधर