खत्री और Crassa


कैसे सहोगी पतली कमर पे रानी,
इतना भार बरसात में.
मेरी बाहों का सहारा ले लो,
नहीं तो खत्री ले जाएगा मझधार में.
मैं तो हूँ दिल का बड़ा भोला – भाला,
धीरे-धीरे करूँगा तुम्हे प्यार।
खत्री तो हैं शातिर – शैतान,
चूस लेगा सारा रस, एक ही बार में.
कैसे संभालोगी अकेले रानी,
ये खनकती जवानी इस संसार में.
मेरे साथ घर बसा लो,
नहीं तो खत्री लूट लेगा ये श्रृंगार रे.
मैं तो हूँ दिल से बड़ा सीधा -सच्चा,
उठाऊंगा नखरे तुम्हारे जीवन भर.
खत्री तो है खिलाड़ी – रंगबाज,
अंग – अंग निचोड़ लेगा, एक ही बार में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

Crassa


आधे लोग तो,
हमें देख के खुद ही गिर जाते हैं,
और आधों को हम गिरा देते हैं.
लोग यूँ हैं नहीं कह उठते हैं,
की “लो आ गया”,
ज्यूँ ही हम दिख जाते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर