ख़ास जिंदगी


थोड़ी – थोड़ी आग है, थोड़ी सी बरसात है,
ये जिंदगी मुझे खुदा, अब भी लगती बड़ी ख़ास है.
ठोकरें भी मेरे हौसले तो नहीं तोड़ पाती हैं,
काँटों के बीच में ही तो कलियाँ मुस्काती हैं.
थोड़ी – थोड़ी आस है, थोड़ी सी प्यास है,
ये जिंदगी मुझे खुदा, अब भी लगती बड़ी ख़ास है.
टूटते ख़्वाब भी नहीं मुझे रोक पाते हैं,
काँटों के बीच में ही तो फूल मुस्काते हैं.

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कर्ण


हर पल में बेचैनी है जिसके,
हर नींद में एक ही चाह,
एक बार सामना तो हो जिंदगी,
मैं रोक दूंगा अर्जुन की हर राह.
ना माँ की दुआएं हैं, न प्रियेसी की प्रीत,
न किसी से आशा है, न किसी का आशीष,
बस एक बार सामना तो हो जिंदगी,
मैं रोक दूंगा अर्जुन की हर जीत.

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

समंदर और मैं


वो रंग नहीं आसमान पे,
जो मुझको फीका कर दे.
वो फूल नहीं इस गुलशन में,
जो मुझको दीवाना कर दे.
बदला है हमने,
हवावों के रुख को,
कई बार इस समंदर में.
वो धार नहीं इन लहरो में,
जो किनारों को मेरे,
डूबा दे, परमीत.