अगर लालू भी पैदा हो


अगर लालू भी पैदा हो,
तो कोई उसे हरा नहीं सकता।
बिहार की धरती को कोई,
बंजर बना नहीं सकता।

शुभारम्भ कैसा भी हो?
याद कर लो: गांधी का चम्पारण, जय प्रकाश नारायण।
शुभारम्भ कैसा भी हो?
किसी का भी हो,
बिहार से जुड़े बिना,
सफल हो नहीं सकता।

जो ये कहते है की,
सत्ता की चाभी यूपी से होक जाती है.
देख लो: नायडू को छोड़ सकते है, नितीश को नहीं।
उन्हें पता नहीं की एक बिहारी,
अयोग्य दामाद को अयोग्य बुला नहीं सकता।

 

परमीत सिंह धुरंधर

Advertisements

वो बिहारी है


जो पत्थरों को करता हो प्यार,
वो बिहारी है.
जो खुद से पहले दीवारों का करे श्रृंगार,
वो बिहारी है.
जो पशुओं के गोबर से,
घर – आँगन को चमका दे,
वो बिहारी है.
जो खुद के पहले,
पशुओं को नहला के खिला दे,
वो बिहारी है.

जो वक्त के आगे बिखरा हो,
पर हर वक्त पे हो भारी,
वो बिहारी है.
जो हो सीधा – सादा, सरल – सच्चा,
पर हर माया से हो मायावी,
वो बिहारी है.
जिसके आँखों में हो ताल,
सुर में हो संग्राम,
और धडकनों में हो इश्क़ की बिमारी,
वो बिहारी है.

जिसके नस – नस में नशा हो मिटटी का,
जो सतुआ से लेता हो ऊर्जा,
और मदहोस हो जाता हो पी के मठ्ठा,
वो बिहारी है.
जो भैसों पे प्रमेय सिद्ध कर देता हो,
जो चीनी संग रोटी खाता हो,
जो लिट्टी – चोखा – खिचड़ी का दावत देता हो,
वो बिहारी है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बिहारी : एक जंगली फूल


वक्त ने कुछ ऐसे
बिहारियों को बिखेरा है.
की कैलिफोर्निया से मारिसस तक
बस भोजपुर और भोजपुरिया का जलवा है.

जहाँ हर उम्मीद टूट जाती है
गहन अँधेरे के तले दब कर.
वहाँ भी हमने अपनी स्वर-संस्कृति-संगीत से
अपनी माटी का दिया जलाया है.

कुछ जलते हैं
कुछ हँसते हैं
कुछ हमें मिटाने की
हसरते पाले हैं.

मगर जंगली फूल ही सही
खुसबू विहीन, रंगहीन ही सही
हमने अपने खून -पसीने से
बंजर को भी गुलशन बनाया है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

माँझी बिहारी


शहंशाह ताज तो बना सकते हैं,
अपने मुमताज के लिए.
लेकिन वो माँझी बिहारी होते हैं,
जो पहाड़ को गिरा दें अपने महबूब के लिए.

 

Dedicated to Dashrat Manjhi from Bihar.

 

परमीत सिंह धुरंधर

फिर बिहार देखिये


शहर देखिये, सुलतान देखिये,
अगर इतिहास देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

शर्म देखिये, सौंदर्य देखिये,
अगर यौवन देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

बलवान देखिये, पहलवान देखिये,
अगर पौरष देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

कलियाँ देखिये, कांटे देखिये,
अगर फूल देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

मुंबई देखिये, दिल्ली देखिये,
अगर किसान देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

काश्मीर देखिये, कन्याकुमारी देखिये,
अगर भारत देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

गीता पढ़िए, कुरान पढ़िए,
अगर इंसानियत पढ़नी है तो,
फिर बिहार देखिये।

नेहरू पढ़िए, गांधी पढ़िए,
देश को जानना है तो,
फिर राजेंद्र बाबू पढ़िए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

तू खांटी सरदारनी, मैं बांका बिहारी


वो शाम की अंगराई, वो रातों की रजाई,
तू मिल जाए मुझको तो, तेरी माँ को मिले जमाई।
तेरी पतली कमर, जैसे मिटटी की ठंढी सुराही,
तू मिल जाए मुझको तो, तेरी माँ को मिले जमाई।
तू खांटी सरदारनी, मैं बांका बिहारी,
तू मिल जाए मुझको तो, तेरी माँ को मिले जमाई।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरी बीबी बिहारन


मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।
मैं करूँ चूल्हा – चौकी,
वो ले धुप-सेवन।
मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।

मेरी कमर झुक रही,
उसका नित खिलता यौवन।
चार-चार बच्चे,
मैं सम्भालूं।
और चालीस में भी,
उसे मांगे रितिक रोशन।
मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।

मैं पढ़ा -लिखा हो कर भी,
अनपढ़ – गवार।
वो शुद्ध देशी,
मोह ले किसी का भी मन.
मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।

मैं मदिरा मांगू,
वो पिलाये मट्ठा।
मैं बोलूं मुर्ग-मसल्लम,
तो वो खिलाये लिट्टी-चोखा।
पर मेरी साँसों को,
वो लगती, हर दिन ए-वन.
मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।

मेरे वीरान जीवन की,
वो सुन्दर उपवन।
उसकी मुस्कान ही है,
मेरा तन-मन-धन.
मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।

 

परमीत सिंह धुरंधर