माँझी बिहारी


शहंशाह ताज तो बना सकते हैं,
अपने मुमताज के लिए.
लेकिन वो माँझी बिहारी होते हैं,
जो पहाड़ को गिरा दें अपने महबूब के लिए.

 

Dedicated to Dashrat Manjhi from Bihar.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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फिर बिहार देखिये


शहर देखिये, सुलतान देखिये,
अगर इतिहास देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

शर्म देखिये, सौंदर्य देखिये,
अगर यौवन देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

बलवान देखिये, पहलवान देखिये,
अगर पौरष देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

कलियाँ देखिये, कांटे देखिये,
अगर फूल देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

मुंबई देखिये, दिल्ली देखिये,
अगर किसान देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

काश्मीर देखिये, कन्याकुमारी देखिये,
अगर भारत देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

गीता पढ़िए, कुरान पढ़िए,
अगर इंसानियत पढ़नी है तो,
फिर बिहार देखिये।

नेहरू पढ़िए, गांधी पढ़िए,
देश को जानना है तो,
फिर राजेंद्र बाबू पढ़िए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

तू खांटी सरदारनी, मैं बांका बिहारी


वो शाम की अंगराई, वो रातों की रजाई,
तू मिल जाए मुझको तो, तेरी माँ को मिले जमाई।
तेरी पतली कमर, जैसे मिटटी की ठंढी सुराही,
तू मिल जाए मुझको तो, तेरी माँ को मिले जमाई।
तू खांटी सरदारनी, मैं बांका बिहारी,
तू मिल जाए मुझको तो, तेरी माँ को मिले जमाई।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरी बीबी बिहारन


मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।
मैं करूँ चूल्हा – चौकी,
वो ले धुप-सेवन।
मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।

मेरी कमर झुक रही,
उसका नित खिलता यौवन।
चार-चार बच्चे,
मैं सम्भालूं।
और चालीस में भी,
उसे मांगे रितिक रोशन।
मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।

मैं पढ़ा -लिखा हो कर भी,
अनपढ़ – गवार।
वो शुद्ध देशी,
मोह ले किसी का भी मन.
मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।

मैं मदिरा मांगू,
वो पिलाये मट्ठा।
मैं बोलूं मुर्ग-मसल्लम,
तो वो खिलाये लिट्टी-चोखा।
पर मेरी साँसों को,
वो लगती, हर दिन ए-वन.
मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।

मेरे वीरान जीवन की,
वो सुन्दर उपवन।
उसकी मुस्कान ही है,
मेरा तन-मन-धन.
मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

विनोद दुआ – रविश कुमार की धर्मनिरपेक्षता


मेरे पोसे चार कबूतर,
रोज उड़ जाते हैं.
दूर- दूर जाते हैं,
आसमाँ में और नए – नए,
मादाओं के संग दाना चुगते हैं.
मगर शाम को मेरे छत पे,
चले आते हैं.
इनके नयी पीढ़ी तो,
बिना सिखाये ही हमारे बन गए हैं.

मेरे पाले चार कुत्ते,
दिन भर मेरे संग घूमते हैं.
किसपे भौकना है,
और किसको काटना है,
ये मेरे आँखों के इशारों से पढ़ लेते हैं.
मैं चाहे दो रोटी दूँ,
या इन्हे भूखा रख दूँ,
ये कभी मेरे द्वार और मुझे नहीं छोड़ते हैं.

मेरे रटाये चार तोते,
दिन – रात मेरे सिखाये शब्द ही नहीं,
नए शब्द भी बोलते हैं.
कभी – कभी तो अपशब्द भी बोलते हैं.
आँगन में छोड़ने पे भी,
अपने पिंजरे में चले जाते हैं.

मेरे पाले – पोसे, खिलाये -पिलाये,
चार मैना, आज महीनो बाद,
पिंजरे से निकालने पे,
ऐसे उड़े की फिर लौटे नहीं, उड़ कर।
मैं परेशान, उदास,
समझने में नाकाम रहा, ये अंतर।

मैं दौड़ कर, भाग कर,
विनोद दुआ – रविश कुमार के पास गया.
उन्होंने कहा की मैना को आज़ादी पसंद है.
जबकि तोता, कुत्ता और कबूतर,
के मन -मस्तिक गुलामी की जंजीरों में,
बंधी हैं.
और उन्हें आज़ादी का आभास नहीं है.

फिर मैंने कहा, “तो आप लोगो की नजर में नितीश कुमार अपराधी कैसे हैं”.
चेहरे का रंग बदल, आँखों में गुस्सा ला कर,
दोनों ने कहा की नितीश कोई मैना हैं क्या?
मानव के लिए, आज़ादी से ज्यादा धर्मनिरपेक्षता जरुरी है.
वो बोलें, “तुम सा मोदी भक्त ये नहीं समझ सकता।”

मैं आज भी भटक रहा हूँ,
की कोई मुझे ये समझा दे.
क्यों मैना को आज़ादी पसंद है?
और क्यों नितीश कुमार को आज़ादी नहीं,
धर्मनिरपेक्षता चुनना चाहिए?
आप अगर जानते हैं, या किसी को जानते हैं,
जो मुझे इसका भेद समझा दे.
तो मुझे जरूर बताये।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरी बीबी है बिहार की


मेरी बीबी है बिहार की,
बिस्तर पे भी रखती है,
घूँघट चार हाथ की.
चार – चार बच्चों की,
अम्मा बन गयी.
पर मैं देख ना पाया,
आज तक तिल उसके नाक की.
मेरी बीबी है बिहार की.

केश ही नहीं, जिस्म पे भी,
लगा लेती है रातों को, करुआ तेल.
चुम्बन की कोसिस में,
मैं फिसलता हूँ ऐसे,
जैसे बंद मुट्ठी में रेत.
कहती है, “आप मेरे भगवान् हो”.
और वो तुलसी मेरे आँगन की.
मेरी बीबी है बिहार की.

 

परमीत सिंह धुरंधर

विष पीने की सनक है


हम बिहारियों की बातें,
ही कुछ अलग है.
कुछ भी नहीं है जीवन में,
पर घमंड बहुत है.
हम भगवान् शिव के ऐसे,
अनन्य भक्त हैं.
जिन्हे अमृत नहीं,
विष पीने की सनक है.
कितनों ने कोशिश की है,
हमें तोड़ने की.
वो जाने किस भीड़ में खो गए,
और हम आज भी अटल हैं.
कितनो ने हमें गवार कहा,
कितनो ने हमारा त्रिस्कार किया,
पर जीवन के संघर्ष में हम प्रथम है.

 

परमीत सिंह धुरंधर