तनी देखि ना पतरा पंडित जी


बड़ी भारी भइल बा जोवन
कर अ ता बड़ी जुलम।
तनी देखि ना पतरा पंडित जी
कहिया लागि लगन?

चढ़ल जाता इ उम्र
सूना – सूना जाता हर सावन।
तनी देखि ना पतरा पंडित जी
कहिया लागि लगन?

सारी सखियाँ भइली लरकोरी
झुल अ तारी भरके गोदी
ललचे रहल – रहल हमरो मन.
तनी देखि ना पतरा पंडित जी
कहिया लागि लगन?

 

परमीत सिंह धुरंधर

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दहेज़ में बैल


बैल मिलल दहेज़ में
अब का बथान चाहता र अ.
अतना सुनर चिड़िया के छोड़के
कहाँ दाना डाल अ ता र अ?

बैल भुखाइल-प्यासल
दिन भर नाद पे
तू कहाँ भूँसा डाल अ ता र अ?
अतना सुनर चिड़िया के छोड़के
कहाँ दाना डाल अ ता र अ?

परमीत सिंह धुरंधर

जोबनवा बेकार होता


वो सैयां जी
तानी करा ना दी गवनवा
जोबनवा बेकार होता।

भौजी रोजे दे तारी उल्हनवा
जोबनवा बेकार होता।
मन हमरो करSता
की धोई राउर बर्तनवा।
जोबनवा बेकार होता।

दरजी बढ़ावता बजनवा
जोबनवा बेकार होता।
बिन निंदिया भइलन नयनवा
जोबनवा बेकार होता।

सींचSता रोजे हमके परधानवा
जोबनवा बेकार होता।
अब का करबा बुढ़ापा में जतनवा
जोबनवा बेकार होता।

ना भैया के चिंता, ना बा बाबुल के फिकरवा
जोबनवा बेकार होता।
दुगो फूल त खिला ल अंगनवा
जोबनवा बेकार होता।

तनी रखी कभी हमरो मनवा
जोबनवा बेकार होता।
की अँटकल बा रउरे में प्राणवा
जोबनवा बेकार होता।

वो सैयां जी
तानी करा ना दी गवनवा
जोबनवा बेकार होता।

 

परमीत सिंह धुरंधर

सौतन खटिया


जब से जवनिया के चोलिया में बंध नी,
नगरिया के सब कोई पूछे ला उमरिया,
कैसे कहीं ए सखी, शर्म के छोड़ के?
सौतन भइल बिया जाड़ा में खटिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

चाहे रख दी चोली खोलके


सैया माँगता दाल पे आचार
घी, दही सजाव छोड़ के.
का से कहीं दिल के बात सखी
आपन लोक-लाज – शर्म छोड़ के.

सांझे के सेजिया पे पसर जालन
कतनो बैठीं श्रृंगार करके।
सैयां निकलल बाटे नादान
का से कहीं, लोक-लाज – शर्म छोड़ के.

तनको ना छुए मिष्ठान
चाहे रख दी चोली खोलके।
तूड़ देहलन सारा दिल के अरमान
का से कहीं, लोक-लाज – शर्म छोड़ के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

पर मोदी जी


पीया हो गइलन परदेश के गुलाम हो,
तनी मोदी जी गांव के भी करि विकास हो.
कट त जाला जेठ और आषाढ़,
पर मोदी जी अकेले ना कटे इ माघ हो.
तनी मोदी जी गांव के भी करि विकास हो.

दुआरा – अंगना, खेत – खलिहान,
हम सब कर लेवेनि।
सास – ससुर, गाय – बैल,
हम सब देख लेवेनि।
पर मोदी जी सेजिया के चोट ना सहात हो.
तनी मोदी जी गांव के भी करि विकास हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कोई अँचरा के हमार ना देख ले


तनी धीमा करीं आग के दुवरा पे,
कोई अँचरा के हमार ना देख ले.

पूछे लागल बारी राउर माई आजकल,
कहाँ जा तारु आधी रात के किवाड़ खोल के.

छोड़ दी आज खटिया के राजा जी,
बिछा लीं चटाई आज भुइयां में.

ना होइ इ खेला रोज – रोज अब हमरा से,
कब तक करीं इ झूठ और ढोंग सास – पतोह से।

जाप और योग करे सब कोई रउर – हमरा उम्र के,
बस हमरा के फँसाइले बानी रउरा इह पाप – कर्म में.

 

परमीत सिंह धुरंधर