एक दिन ऐसा कलजुग आएगा


रामचन्द्र जी कह गए सिया से, एक दिन ऐसा कलजुग आएगा।
वक्षों पे खेलेंगे कुत्ते,और कुत्तों पे वक्ष होगा।
नारी-हितेषी भटकेगा गलियों में ठोकर खाते,
और जो दलेगा नारी को, वो उसकी बाहों में होगा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

कुत्ते और वक्ष


कुत्ते भी क्या – क्या चमत्कार करते हैं!
कोई चुम रहा है उनकी पाँवों को,
तो कोई वक्षों से लगा बैठा है.
अब किस्मत और मौसम,
दोनों कुत्तों के साथ है शहर में.
ठण्ड भरे इस मौसम में,
मैं शायर बनके रोता हूँ,
और कोई उन्हें अपनी बाहों,
तो कोई वक्षों पे सुलाता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कुत्तों की एक भीड़ लग गयी शहर में


कुत्ते कुछ इस कदर भोकें,
बिल्लियाँ सहम गयी सारे सहर में.
और खेल भी देखो जनाब हड्डियों का,
उसने इस कदर फेंकी हड्डियां,
की कुत्तों की एक भीड़ लग गयी शहर में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न और कुत्ता


एक भीड़ सी लगी है कुत्तों की,
और हुस्न वाले कहते हैं,
की पुरुष में अहंकार बहुत है.
सब – कुछ रख दिया है उनकी चरणों में,
लात खा कर भी वही पड़े हैं,
और हुस्न वाले कहते हैं,
की पुरुष में अहंकार बहुत है.
सबसे बड़ी अहिषुण्ता, दोगलापन है ये,
नारी ही उजाड़ रही है घर नारी का,
और हुस्न वाले कहते हैं,
की पुरुष को जिस्म की भूख बहुत है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न और कुत्ता


पालतू कुत्तों की एक भीड़ खड़ी है,
फिर भी हुस्न वाले कहते है,
पुरुष अहंकारी बहुत है.
जाने कैसे लिखते है वो दोहे,
मेरी कलम ने,
तो बस एक सच्चाई लिखी है.

परमीत सिंह धुरंधर

कुत्ता और चाँद


कुत्ते दौड़ते हुए गलियों में,
उनका रूप चुराने को.
अम्बर पे चाँद हंस रहा,
देख अपने दीवानों को.
कुत्तों की किस्मत में नहीं,
चाँद से अपने मिल पाना।
ना चाँद के भाग्य में है,
इन कुत्तों जैसा कोई दीवाना।

परमीत सिंह धुरंधर

कुत्ते


यहाँ-वहां हर तरफ, हर रह में,
खर्डे हैं अनजाने कुत्ते,
अंधकार में भोंक रहे
जाने किसकी चाहत में.
दुर्लभ है एसा सानिध्य,
दोड़ रहे हैं एक साथ,
जाने किस मंजिल की चाहत में.
चीरते हैं अंधकार की खामोसियाँ,
चमकाते हैं आँखों को, जैसे
आसमां की बिजलियाँ.
पुकारते हैं, सर को
आसमां की तरफ कियें,
गा रहे हैं गीत मिलन का वलेंतिने’स डे पर,
ना जाने परमित, किस की चाहत में.